दसवीं शताब्दी की प्रतिमा होने का शोधकर्ताओं का अनुमान; दो भुजाओं वाले तपस्वी स्वरूप में अनोखे गणेश दर्शन
जेजुरी (प्रतिनिधि) : विजय कुमार हरिश्चन्द्र
महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की धूम के बीच भगवान गणेश के विभिन्न रूपों के दुर्लभ दर्शन और उनसे जुड़े ऐतिहासिक विरासत की चर्चा हो रही है। पुरंदर तहसील के प्राचीन तीर्थक्षेत्र जेजुरी में भी ऐसी ही एक अनोखी धातु की गणेश प्रतिमा ने श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया है। डोकरा आदिवासी कला-संस्कृति से साम्य रखने वाली यह प्रतिमा करीब एक हजार वर्ष पुरानी होने का प्राथमिक अनुमान शोधकर्ताओं ने व्यक्त किया है।

जेजुरी के खंडोबा देव के पारंपरिक पुजारी रहे हरिश्चंद्र बंधु परिवार के वाड़े में यह प्रतिमा संरक्षित है। वर्तमान में श्रद्धालुओं को इसके दर्शन हो रहे हैं। अपने अनोखे स्वरूप के कारण यह प्रतिमा जेजुरी परिसर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
इस प्रतिमा का हरिश्चंद्र वाड़े में प्रवेश कब और कैसे हुआ, इसकी ठोस ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि परिवार की ओर से इसे श्रद्धापूर्वक संरक्षित एवं पूजित किया जा रहा है। हरिश्चंद्र बंधु परिवार के किशोर हरिश्चंद्र ने भी वाड़े में प्रतिमा उपलब्ध होने की जानकारी दी। हालांकि इसके आगमन का सटीक इतिहास बताना कठिन होने की बात उन्होंने स्पष्ट की।
दो भुजाओं वाला तपस्वी स्वरूप
प्रतिमा की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि भगवान गणेश को केवल दो भुजाओं में दर्शाया गया है। पूरी प्रतिमा का स्वरूप किसी तेजस्वी ऋषि-मुनि या तपस्वी जैसा प्रतीत होता है। प्रतिमा पर की गई कलाकारी, चेहरे के भाव और शरीर की बनावट पारंपरिक गणेश प्रतिमाओं से अलग दिखाई देती है।
प्रतिमा की संरचना और कलाशैली का अवलोकन करने पर इसके डोकरा आदिवासी धातुकला से साम्य होने की बात सामने आई है। इस कलाशैली और प्राचीन धातुशिल्प परंपरा का गहन अध्ययन होने पर प्रतिमा के कालखंड और निर्माण की प्रकृति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
जेजुरी मार्तंड देवस्थान के पूर्व प्रमुख ट्रस्टी एवं खंडोबा के अभ्यासक डॉ. प्रसाद खंडागळे ने प्रतिमा के दर्शन के बाद कहा कि प्रतिमा की संरचना और कलाशैली को देखते हुए इसका संबंध प्राचीन काल से होने की संभावना दिखाई देती है। उन्होंने इसके दसवीं शताब्दी के आसपास का होने का प्राथमिक अनुमान व्यक्त किया। हालांकि इसके लिए पुरातात्त्विक, धातुशास्त्रीय और शिल्पशास्त्रीय अध्ययन आवश्यक है।
क्या जयाद्री की ऋषि-मुनि परंपरा से है संबंध?
जेजुरी एक प्राचीन धार्मिक और ऐतिहासिक तीर्थक्षेत्र है। जयाद्री की पहाड़ियों और घाटियों में पूर्वकाल में ऋषि-मुनियों के निवास की धार्मिक परंपराएं बताई जाती हैं। शुक्लेश्वर, बोंबलेश्वर तथा परिसर के अन्य प्राचीन शिवस्थलों के कारण इस क्षेत्र को समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत प्राप्त हुई है।
खंडोबा उपासना से जुड़ी विभिन्न धार्मिक परंपराएं और शिवभक्ति की साधना इस क्षेत्र में प्राचीन काल से चली आ रही होने की स्थानीय मान्यताएं हैं। इसलिए इस गणेश प्रतिमा का जयाद्री क्षेत्र अथवा तत्कालीन धातुकला परंपरा से कोई संबंध है या नहीं, इसका अध्ययन होना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दुर्लभ गणेश रूपों की समृद्ध विरासत
पुरंदर तहसील में गणेश के विभिन्न दुर्लभ और विशिष्ट रूप देखने को मिलते हैं। भुलेश्वर मंदिर में वैनायकी अर्थात स्त्रीरूप वाली गणेश प्रतिमा शिल्पकला की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। इसी परिसर में भारवाहक अथवा ‘ओझेवाला गणपति’ के नाम से पहचानी जाने वाली स्तंभ पर उत्कीर्ण गणेश प्रतिमा तथा नृत्यरूप वाली गणेश शिल्पाकृतियां भी मिलती हैं। वहीं नायगांव की चतुर्भुज गणेश प्रतिमा सिद्धेश्वर मंदिर में अपने विशिष्ट स्वरूप में देखने को मिलती है।
इस कारण पुरंदर–जेजुरी–जयाद्री घाटी क्षेत्र में पाए जाने वाले गणेश शिल्पों का स्वतंत्र एवं व्यापक अध्ययन किए जाने की आवश्यकता सामने आती है। इस क्षेत्र की अनेक प्राचीन प्रतिमाएं आज भी उपेक्षित अवस्था में हैं। उनके इतिहास, कालखंड, शिल्पशैली और सांस्कृतिक संदर्भों को शोध के माध्यम से सामने लाना आवश्यक है।
इस अनोखी गणेश प्रतिमा के दर्शन के लिए डॉ. प्रसाद खंडागळे, पूर्व नगराध्यक्ष साधनाताई दिडभाई, वरिष्ठ पत्रकार शिवराज झगडे और आसिफ मुजावर ने भेंट दी।
प्रतिमा के दर्शन के बाद मार्तंड देवस्थान के अध्यक्ष ॲड. विश्वास पानसे ने कहा कि यह गणेश प्रतिमा अत्यंत अनोखी, अलग और मन को प्रसन्नता प्रदान करने वाली है।
पुरंदर क्षेत्र प्राचीन, पौराणिक और ऐतिहासिक विरासत से समृद्ध है। कर्हा नदी क्षेत्र से लेकर जयाद्री की पहाड़ियों और घाटियों तक अनेक प्राचीन मंदिर, शिल्प और प्रतिमाएं आज भी इतिहास की साक्षी बनकर खड़ी हैं। इस विरासत का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, पुरातात्त्विक जांच और गहन अध्ययन किया जाए तो पुरंदर–जेजुरी के प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास के अनेक अज्ञात पहलू सामने आ सकते हैं। हरिश्चंद्र वाड़े में संरक्षित इस अनोखी गणेश प्रतिमा ने इस आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित किया है।