एम्स ऋषिकेश में आचार्य प्रशांत का युवाओं से संवाद

ऋषिकेश। दार्शनिक विचारक और लेखक आचार्य प्रशांत ने एम्स ऋषिकेश में आयोजित विशेष संवाद सत्र में युवा चिकित्सकों, शोधार्थियों और फैकल्टी

एम्स ऋषिकेश में आचार्य प्रशांत का युवाओं से संवाद

आध्यात्म से ही मिटेगी भीतर की बेचैनी   : आचार्य प्रशांत 

ऋषिकेश। दार्शनिक विचारक और लेखक आचार्य प्रशांत ने एम्स ऋषिकेश में आयोजित विशेष संवाद सत्र में युवा चिकित्सकों, शोधार्थियों और फैकल्टी सदस्यों को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने मनोविज्ञान, जीवन के उद्देश्य, लैंगिक पहचान और अध्यात्म जैसे जटिल विषयों पर स्पष्ट और बेबाक विचार रखे।
 एम्स सभागार में  निदेशक मीनू सिंह तथा डायरेक्टर सौरभ वार्ष्णेय ने आचार्य प्रशांत को अंगवस्त्र तथा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।बड़ी संख्या में मौजूद छात्रों और डॉक्टरों के बीच सत्र की शुरुआत एक खुली बातचीत से हुई। युवा भावी चिकित्सकों के एक पैनल ने आचार्य प्रशांत से सीधे सवाल पूछे, जिससे चिकित्सा और दर्शन के बीच एक जीवंत संवाद देखने को मिला। जीवन के उद्देश्य पर चर्चा करते हुए उन्होंने प्रचलित धारणाओं को चुनौती दी। उनका कहना था कि लोग जिस ‘उद्देश्य’ की तलाश करते हैं, वह अक्सर उनकी अपनी समझ नहीं होती, बल्कि समाज से बिना जांचे-परखे अपनाई गई अवधारणाएं होती हैं। उन्होंने कहा, “जब तक भीतर बेचैनी है, तब तक उद्देश्य की जरूरत बनी रहेगी। सवाल यह है कि यह बेचैनी आती कहां से है?”
उन्होंने श्रोताओं को आत्मपरीक्षण की ओर प्रेरित करते हुए कहा कि बिना इस मूल प्रश्न को समझे कोई भी लक्ष्य स्थायी संतोष नहीं दे सकता।
 आचार्य प्रशांत ने महिला सशक्तिकरण के विषय पर भी उन्होंने पारंपरिक विमर्श से अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने माना कि आरक्षण और संस्थागत अवसर जरूरी हैं, लेकिन समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हैं। उनके अनुसार, महिलाओं की स्थिति का मूल कारण सामाजिक या आर्थिक से अधिक मनोवैज्ञानिक है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं भी मानसिक रूप से बंधी रह सकती हैं, क्योंकि “स्त्री” की पहचान एक गहरी मानसिक संरचना के रूप में मौजूद रहती है। उन्होंने कहा, “मुक्ति उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उस पहचान से बाहर निकलने में है जिसे हमने खुद पर ओढ़ रखा है।”
संवाद में आचार्य प्रशांत ने ईशावास्य उपनिषद के शांतिपाठ की व्याख्या करते हुए आधुनिक “पॉप अध्यात्म” पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आज के समय में अध्यात्म को अक्सर सतही रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो व्यक्ति के अहंकार को समाप्त करने के बजाय उसे और मजबूत करता है। उनके अनुसार, अहंकार हमेशा विभाजन पर आधारित होता है और वह ज्ञान के ग्रंथों को भी अपने विस्तार का माध्यम बना लेता है। सच्चा अध्यात्म वही है जो इन सीमाओं को समाप्त कर दे।

देशभर के प्रमुख संस्थानों में दे चुके हैं व्याख्यान

 एम्स ऋषिकेश संस्थान में उनका तीसरा संबोधन रहा। इससे पहले वे एम्स नागपुर और एम्स रायपुर में भी छात्रों और चिकित्सकों से संवाद कर चुके हैं। इसके अलावा मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज और इएसआईसी मेडिकल कॉलेज हैदराबाद जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी उन्होंने अपने विचार रखे हैं।
उल्लेखनीय है कि आचार्य प्रशांत प्रशांतअद्वैत फ़ाउंडेशन के संस्थापक हैं, जो वैश्विक स्तर पर ज्ञान-साहित्य पर संवाद का मंच संचालित करता है। वे आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र हैं।
उनकी हालिया पुस्तक Truth Without Apology प्रकाशन के बाद से ही चर्चा में बनी हुई है और बेस्टसेलर सूची में शामिल है। कार्यक्रम के दौरान छात्रों और चिकित्सकों ने उनके विचारों को गंभीरता से सुना और संवाद के माध्यम से कई जटिल प्रश्नों पर खुलकर चर्चा की। यह सत्र चिकित्सा जगत और दर्शन के बीच एक सार्थक सेतु के रूप में सामने आया।