विधायक अरविन्द पांडेय की प्रशासन को चुनौती अगर अतिक्रमण किया है तो हटाओ

गदरपुर। गदरपुर की राजनीति इन दिनों शतरंज की बिसात बन चुकी है। भाजपा विधायक अरविंद पाण्डेय ने अतिक्रमण के नोटिस पर जिस अंदाज़ में जवाब दिया है

विधायक अरविन्द पांडेय की प्रशासन को चुनौती अगर अतिक्रमण किया है तो हटाओ

प्रदीप फुटेला 

गदरपुर। गदरपुर की राजनीति इन दिनों शतरंज की बिसात बन चुकी है। भाजपा विधायक अरविंद पाण्डेय ने अतिक्रमण के नोटिस पर जिस अंदाज़ में जवाब दिया है, वह सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया का जवाब नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक चाल मानी जा रही है।
पत्र में उन्होंने साफ कहा—यदि उनके कैंप कार्यालय और आवास का कोई भी हिस्सा सरकारी भूमि पर पाया जाता है, तो प्रशासन मौके पर चिन्हीकरण कर उसे अपने कब्जे में ले ले। “मुझे और मेरे वारिसान को कोई आपत्ति नहीं है”—यह पंक्ति सीधे-सीधे ‘ईमानदारी का सर्टिफिकेट’ लेने की कोशिश भी मानी जा रही है।
      इस बयान का पहला असर प्रशासन पर पड़ता है। अब अगर जांच होती है, तो वह पारदर्शी होनी चाहिए। अगर कार्रवाई नहीं होती, तो सवाल उठेंगे कि नोटिस क्यों दिया गया? और अगर होती है, तो क्या अन्य प्रभावशाली लोगों पर भी यही पैमाना लागू होगा?
दूसरा और ज्यादा अहम संकेत सरकार की ओर है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा नई नहीं है कि विधायक पाण्डेय और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बीच संबंध मधुर नहीं हैं। दोनों के बीच “छत्तीस का आंकड़ा” होने की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं। ऐसे में यह पत्र महज़ कानूनी जवाब नहीं, बल्कि एक अघोषित चुनौती के रूप में भी देखा जा रहा है—“अगर मैं गलत हूं तो कार्रवाई करो, लेकिन फिर सब पर करो।”
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद अनिल बलूनी और वरिष्ठ विधायक विशन सिंह चुफाल जैसे नेता पहले भी पाण्डेय के समर्थन में खड़े नजर आए हैं। इससे यह संकेत भी मिलता है कि पार्टी के भीतर खेमेबाज़ी की रेखाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाण्डेय का यह कदम दोहरे फायदे की रणनीति है—अगर प्रशासन पीछे हटता है तो वे खुद को बेदाग साबित कर सकते हैं।
अगर सख्त कार्रवाई होती है तो वे “राजनीतिक प्रताड़ना” का नैरेटिव खड़ा कर सकते हैं।दोनों ही स्थितियों में वे खुद को पीड़ित नहीं, बल्कि चुनौती देने वाले नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
राजनीति में बयान कभी सीधे नहीं होते। हर शब्द नापा-तौला होता है। “सरकारी जमीन है तो ले लो”—यह वाक्य जनता के बीच सीधा संदेश देता है कि विधायक कुछ छिपा नहीं रहे। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह नैतिक ऊंचाई लेने की रणनीति है, ताकि विरोधी खेमे पर दबाव बने?
गदरपुर और आसपास के क्षेत्रों में अतिक्रमण कोई नई बात नहीं है। बाजार, आवासीय कॉलोनियां, सरकारी भूमि—हर जगह विवाद हैं। ऐसे में अगर विधायक खुद जांच की मांग कर रहे हैं, तो वे खुद को बाकी लोगों से अलग दिखाने की कोशिश भी कर रहे हैं।
  एक बात तय है—यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं रहा। यह भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन, नेतृत्व की स्वीकार्यता और राजनीतिक संदेश की लड़ाई बन चुका है।
अरविंद पाण्डेय ने गेंद सरकार और प्रशासन के पाले में डाल दी है। अब देखना यह है कि यह चुनौती स्वीकार होती है या मामला फाइलों में ही ठंडा पड़ जाता है।गदरपुर की यह सियासी गर्मी आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रही है। उल्लेखनीय है कि भाजपा के ही नेता जो उनके धुर विरोधी हैं वह लगातार विधायक अरविन्द पांडेय पर सवाल उठा रहे हैं, अब तो  खुलेआम विधायक अरविन्द पांडेय को घेरा जा रहा है, लेकिन विधायक अरविन्द पांडेय भी मंझे हुए खिलाड़ी हैं वह अपनी हर चाल से विरोधियों को चित्त कर रहे हैं।