बुक्सा जमीन विवाद: कानून, राजनीति और अधिकारों की जंग में फंसे किसान
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के बाजपुर–गदरपुर क्षेत्र में बुक्सा जनजाति (ST) की जमीन को लेकर उठा विवाद अब केवल एक स्थानीय मामला नहीं रह गया है
बुक्सा जनजाति की जमीनों की खरीद फरोख्त में खेला
प्रदीप फुटेला
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के बाजपुर–गदरपुर क्षेत्र में बुक्सा जनजाति (ST) की जमीन को लेकर उठा विवाद अब केवल एक स्थानीय मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह कानूनी व्यवस्था, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और जनजातीय अधिकारों की बड़ी बहस में बदल चुका है। उत्तराखंड जनजाति आयोग के सदस्य बाबू सिंह तोमर के बयान के बाद इस मामले ने और तूल पकड़ लिया है। उन्होंने साफ कहा कि यह केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि पूरे जनजाति समाज के अधिकारों और संरक्षण पर सीधा हमला है।
जमीन विवाद की जड़ क्या है?
आरोप है कि बुक्सा समुदाय की करीब 3 एकड़ 15 बिस्वा जमीन कथित तौर पर गलत तरीके से विधायक अरविन्द पांडेय के बेटे अतुल पांडेय के नाम कर दी गई इस जमीन को बाद में बेचे जाने से कई किसानों के लाखों रुपये फंस गए। सवाल यह उठ रहा है कि जिस जमीन पर जनजातीय कानूनों के तहत स्पष्ट प्रतिबंध है, वह आखिर कैसे ट्रांसफर हुई और फिर खुले बाजार में बिक भी गई।
2010 में विधायक के बेटे द्वारा जमीन पर 50 साल से कब्जा होने का दावा किया गया, जबकि उस समय उनकी उम्र मात्र 16 साल थी। यह तथ्य खुद ही कई सवाल खड़े करता है। इसके बाद 2020 में यही जमीन करीब 28 लाख रुपये में बेची गई। 2023 में कुमाऊं कमिश्नर ने इस जमीन को बुक्सा परिवार को वापस करने के आदेश दिए, लेकिन इसके बावजूद आज तक जमीन का वास्तविक हस्तांतरण अधूरा है और किसान परेशान हैं।
कानून क्या कहता है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कानून। उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (जो उत्तराखंड में भी लागू है) की धारा 157-ए के तहत अनुसूचित जनजाति (ST) की जमीन को गैर-जनजाति व्यक्ति को बेचना प्रतिबंधित है। यदि किसी कारणवश ऐसा करना हो तो जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति अनिवार्य होती है। बिना अनुमति किया गया कोई भी सौदा अवैध माना जाता है।
इस कानून का मूल उद्देश्य है—जनजातीय समुदायों को शोषण से बचाना, उनकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें भूमिहीन होने से रोकना। बुक्सा जनजाति, जो आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर मानी जाती है, के लिए यह प्रावधान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
किसानों की परेशानी और आरोप
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा नुकसान उन किसानों का हुआ है, जिन्होंने यह जमीन खरीदने के लिए अपनी जीवन भर की कमाई लगा दी। अब जब जमीन का मालिकाना हक विवादों में है, तो उनका पैसा भी फंस गया है और जमीन भी हाथ से निकलती दिख रही है।
किसानों का आरोप है कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है। उनका कहना है कि विधायक परिवार ने जमीन बेचते समय उन्हें कानून की जानकारी नहीं दी और अब जब मामला खुला है तो जिम्मेदारी लेने से बचा जा रहा है। कुछ किसान तो यहां तक कह रहे हैं कि “चोरी के साथ सीनाजोरी” की स्थिति बन गई है।
प्रशासनिक भूमिका पर सवाल
इस मामले में प्रशासन की भूमिका भी कटघरे में है। सवाल यह उठ रहा है कि जब कानून स्पष्ट है तो जमीन का ट्रांसफर कैसे हुआ? क्या राजस्व रिकॉर्ड में छेड़छाड़ हुई? क्यों कमिश्नर के आदेश के बावजूद जमीन वापस नहीं की गई?
हाल ही में बाजपुर तहसील के एक रजिस्ट्रार कानूनगो को इस मामले में उत्तरकाशी अटैच किया गया है, जो इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक स्तर पर भी कुछ गड़बड़ी की आशंका है। हालांकि यह कार्रवाई कितनी प्रभावी होगी, यह आने वाला समय बताएगा।
राजनीतिक एंगल: आरोप-प्रत्यारोप तेज
जैसे-जैसे मामला तूल पकड़ रहा है, राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्ष इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ हथियार बना रहा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह मामला “भू-माफिया और सत्ता के गठजोड़” का उदाहरण है, जहां जनजातीय जमीन को नियमों को ताक पर रखकर हड़पा गया।
वहीं सत्तारूढ़ पक्ष के नेता भी अरविन्द पांडेय को घेरने में लगे हैं विधायक अरविन्द पांडेय अब चौतरफा घिर गए हैं भाजपा विधायक होने के बावजूद भाजपाई ही उनका विरोध कर रहे हैं खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से भी उनका बैर है। अब तो विधायक अरविन्द पांडेय पार्टी में अकेले पड़ते दिख रहे हैं, गत दिवस उनके हस्ताक्षर से एक पत्र वायरल हुआ जिससे राजनीति में हड़कंप मच गया। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भाजपा को घेरते हुए इस पत्र की सत्यता के एसआईटी गठित कर जांच कराने की मांग की है।परिवार की ओर से भी यह कहा गया है कि उनकी नीयत साफ है और उन्होंने कानून के तहत ही कार्य किया है।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ, तो फिर कमिश्नर को जमीन वापस करने का आदेश क्यों देना पड़ा?
जनजाति आयोग की चेतावनी
जनजाति आयोग के सदस्य ने साफ कहा है कि यदि इस तरह के मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह पूरे जनजातीय समाज के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो और प्रभावित किसानों को न्याय मिले।
यह मामला केवल एक जमीन विवाद नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की परीक्षा है, जो कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। अगर कानून होने के बावजूद इस तरह की घटनाएं होती हैं, तो यह व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है।
बुक्सा जनजाति जैसे समुदायों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी पहचान और आजीविका का आधार है। ऐसे में यदि उनकी जमीन पर ही सवाल उठने लगें, तो यह सामाजिक असंतुलन को जन्म दे सकता है।
अब देखना यह है कि प्रशासन और सरकार इस मामले में कितनी तेजी और निष्पक्षता से कार्रवाई करते हैं। क्या किसानों को उनका पैसा वापस मिलेगा? क्या जनजातीय जमीन वास्तव में उनके पास लौटेगी? और सबसे अहम—क्या इस मामले में राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर न्याय हो पाएगा? फिलहाल, यह विवाद उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए एक बड़ी परीक्षा बन चुका है।


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