आत्मा और ऊर्जा: विज्ञान और अध्यात्म के बीच जीवन मृत्यु का शाश्वत सेतु

​मानव सभ्यता की शुरुआत से ही एक प्रश्न हर दार्शनिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक साधक के मन में कौंधता रहा है—जीवन का मूल क्या है और मृत्यु के बाद हमारा क्या होता है?

आत्मा और ऊर्जा: विज्ञान और अध्यात्म के बीच जीवन मृत्यु का शाश्वत सेतु

​विजय दीक्षित

सीनियर एडिटर, अमृत बाजार पत्रिका युगांतर समूह, कोलकाता

​मानव सभ्यता की शुरुआत से ही एक प्रश्न हर दार्शनिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक साधक के मन में कौंधता रहा है—जीवन का मूल क्या है और मृत्यु के बाद हमारा क्या होता है? क्या मृत्यु ही सब कुछ का अंत है, या यह केवल एक नए अध्याय की शुरुआत है? इस रहस्य को सुलझाने के लिए जब हम प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों को एक साथ रखकर देखते हैं, तो एक अद्भुत और अचूक समानता दिखाई देती है। 

गीता में जिसे 'आत्मा' कहा गया है, आधुनिक विज्ञान उसे 'ऊर्जा' का नाम देता है। इन दोनों का स्वरूप, इनकी प्रकृति और इनका व्यवहार एक जैसा है। इस तकनीकी युग में, जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम फिजिक्स की बात करते हैं, तब भी गीता का वह प्राचीन ज्ञान उतना ही प्रासंगिक है, जितना हजारों वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र के मैदान में था।

​आत्मा- ऊर्जा के मौलिक सिद्धांत,अजर-अमर

​श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

अर्थात, इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है, न जल इसे गला सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है। यह आत्मा शाश्वत, अजर और अमर है।

​अब इस आध्यात्मिक सत्य को विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं। भौतिक विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है 'ऊर्जा संरक्षण का नियम'। यह नियम स्पष्ट रूप से कहता है— "ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है"।

​क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जो बात श्रीकृष्ण ने हजारों साल पहले कही थी, वही बात आज का आधुनिक विज्ञान अपने फॉर्मूले के जरिए सिद्ध कर रहा है? आत्मा और कुछ नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का ही एक सूक्ष्म रूप है। शरीर एक यंत्र है, और आत्मा उसे चलाने वाली विद्युत। जब कोई मशीन खराब हो जाती है, तो उसके भीतर प्रवाहित होने वाली बिजली नष्ट नहीं होती, वह वापस अपने स्रोत में मिल जाती है।

​मिलन और विछोह

शरीर रूपी वस्त्र और ऊर्जा का प्रवाह। ​जीवन क्या है? अगर हम तार्किक दृष्टि से देखें, तो जीवन 'पदार्थ' और 'ऊर्जा' का मिलन है। जब पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से बने इस भौतिक शरीर में चेतना रूपी ऊर्जा प्रवेश करती है, तो जीवन का संचार होता है। इस मिलन को ही हम 'जन्म' कहते हैं।

​इसके विपरीत, जब यह शरीर रूपी ढांचा समय के साथ या किसी बीमारी/दुर्घटना के कारण जर्जर हो जाता है और उस ऊर्जा को धारण करने में अक्षम हो जाता है, तो ऊर्जा उस शरीर को त्याग देती है। इस विछोह को हम 'मृत्यु' कहते हैं।

​गीता में इसे वस्त्र बदलने की प्रक्रिया के समान बताया गया है:

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-, न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥(जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने और जर्जर शरीर को त्याग कर नए शरीर में प्रवेश करती है।)

​इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए आपके कमरे में एक बल्ब (शरीर) जल रहा है। बल्ब रोशनी इसलिए दे रहा है क्योंकि उसमें विद्युत ऊर्जा (आत्मा) प्रवाहित हो रही है। जब बल्ब फ्यूज हो जाता है, तो क्या बिजली मर जाती है? नहीं। बिजली वहीं रहती है, केवल वह बल्ब उस बिजली को प्रकाश में बदलने के योग्य नहीं रहा। जब आप एक नया बल्ब लगाते हैं, तो वही बिजली फिर से प्रकाश देने लगती है। आत्मा का शरीर बदलना भी ठीक इसी तरह ऊर्जा का स्थानांतरण है।

अच्छी और बुरी आत्माएं: वाइब्रेशन और ऊर्जा की फ्रीक्वेंसी

​समाज में अक्सर 'अच्छी आत्मा' और 'बुरी आत्मा' या भूत-प्रेत जैसे विषयों पर चर्चा होती है। कई बार इसे अंधविश्वास मानकर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन अगर इसे ऊर्जा के नजरिए से समझें, तो इसका भी एक वैज्ञानिक आधार है।

​ब्रह्मांड में हर ऊर्जा की अपनी एक 'फ्रीक्वेंसी' या तरंग होती है। मनुष्य के विचार, भावनाएं और कर्म भी ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। जब कोई व्यक्ति प्रेम, करुणा, दया और परोपकार के साथ जीवन जीता है, तो उसके भीतर की ऊर्जा अत्यंत सकारात्मक और उच्च फ्रीक्वेंसी वाली होती है। ऐसी आत्माएं जब शरीर त्यागती हैं, तो वे आसानी से ब्रह्मांडीय ऊर्जा (परमात्मा) में विलीन हो जाती हैं या उच्च लोकों की ओर गमन करती हैं। इन्हें हम 'पुण्यात्मा' या 'अच्छी आत्मा' कहते हैं। इनका प्रभाव हमेशा शांतिदायक होता है।

​इसके विपरीत, जब कोई व्यक्ति क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मोह या किसी गहरी अतृप्त इच्छा के साथ मरता है, तो उसकी ऊर्जा बहुत ही भारी और नकारात्मक हो जाती है। विज्ञान कहता है कि भारी ऊर्जा नीचे की ओर बैठती है। ऐसी आत्माएं अपने भौतिक मोह और अतृप्त इच्छाओं के कारण आसानी से इस पृथ्वी के वायुमंडल को नहीं छोड़ पातीं। वे अपने पुराने शरीर, परिवार या धन के आस-पास ही भटकती रहती हैं। चूंकि उनके पास भौतिक शरीर नहीं होता, लेकिन इच्छाएं भौतिक होती हैं, इसलिए वे बेचैन रहती हैं। इसी अटकी हुई नकारात्मक ऊर्जा को लोकभाषा में 'बुरी आत्मा', 'प्रेत' या 'अशांत आत्मा' कहा जाता है।

​जब हम कहते हैं कि किसी स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा है, तो उसका सीधा अर्थ है कि वहां किसी ऐसी चेतना का वास है जिसकी फ्रीक्वेंसी बहुत कम और अशांत है। ध्यान, प्रार्थना और मंत्रोच्चार के माध्यम से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें इन नकारात्मक ऊर्जाओं को छिन्न-भिन्न कर सकती हैं या उन्हें शांति प्रदान कर उच्च लोकों की ओर भेज सकती हैं।

​प्रकृति में पानी का चक्र और जीवन का चक्र

​प्रकृति अपने आप में आत्मा और ऊर्जा के रहस्य को समझाने का सबसे बड़ा स्कूल है। पानी का चक्र इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। नदी का पानी (जीवन) सूर्य की गर्मी से भाप (मृत्यु के बाद आत्मा) में बदल जाता है। भाप को हम देख नहीं सकते, लेकिन उसका अस्तित्व खत्म नहीं होता। वह आसमान में जाकर बादल बनती है और फिर बारिश (पुनर्जन्म) के रूप में वापस धरती पर आ जाती है। पानी वही है, केवल उसका रूप और स्थान बदलता रहता है। बर्फ, पानी और भाप—ये तीनों एक ही तत्व के अलग-अलग भौतिक रूप हैं, जैसे बचपन, जवानी और बुढ़ापा। और इन सबके बीच जो H2O (मॉलिक्यूल) है, वह कभी नहीं बदलता, ठीक उसी तरह जैसे आत्मा कभी नहीं बदलती।

​एक और उदाहरण रेडियो का लिया जा सकता है। रेडियो सेट (शरीर) के भीतर गाने नहीं होते। वह तो हवा में मौजूद रेडियो तरंगों (ऊर्जा/आत्मा) को पकड़कर उसे ध्वनि में बदलता है। अगर आप रेडियो सेट को तोड़ दें, तो प्रसारण बंद हो जाएगा, लेकिन क्या वह गाना या वह रेडियो तरंगें हवा से खत्म हो जाएंगी? बिल्कुल नहीं। आप दूसरा रेडियो लाएंगे और उसी फ्रीक्वेंसी को ट्यून करेंगे, तो गाना फिर से बजने लगेगा।

​जीवन का एक नया दृष्टिकोण

​आत्मा और ऊर्जा के इस संबंध को समझ लेने के बाद मृत्यु का भय स्वतः ही समाप्त हो जाता है। मृत्यु जीवन का विपरीत नहीं है, बल्कि मृत्यु तो केवल जन्म का विपरीत है। जीवन का कोई विपरीत नहीं होता; जीवन निरंतर है, शाश्वत है।

​जब हम यह जान लेते हैं कि हम केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं, बल्कि अनंत ऊर्जा का एक अंश हैं, तो हमारे जीने का तरीका बदल जाता है। हम अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचय करने लगते हैं। गीता और विज्ञान, दोनों का एक ही संदेश है— न कुछ खोता है, न कुछ नष्ट होता है, सब कुछ बस एक रूप से दूसरे रूप में बह रहा है।

​पत्रकारिता और समाज के एक सजग प्रहरी के रूप में, यह समझना आवश्यक है कि जो समाज अपनी आध्यात्मिक जड़ों को वैज्ञानिक तार्किकता के साथ जोड़कर देखता है, वह कभी भ्रमित नहीं होता। आइए, इस ऊर्जा को पहचानें और अपने कर्मों की फ्रीक्वेंसी को इतना उच्च बनाएं कि जब यह ऊर्जा शरीर रूपी इस बल्ब को छोड़े, तो सीधे उस परम प्रकाश (परमात्मा) में जाकर विलीन हो जाए।