जनसंख्या वृद्धि होने से सभी सरकारी योजनाओं पर लग रहा है पलीता
भारत में हर साल बजट आता है, नई योजनाएँ लॉन्च होती हैं, बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद वही पुराना सवाल सिर उठाता है — ज़मीन पर बदलाव क्यों नहीं दिखता?
भारत में हर साल बजट आता है, नई योजनाएँ लॉन्च होती हैं, बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद वही पुराना सवाल सिर उठाता है — ज़मीन पर बदलाव क्यों नहीं दिखता? इसका सबसे सीधा जवाब है: अनियंत्रित जनसंख्या। जितने संसाधन जुटाए जाते हैं, उससे कई गुना ज़्यादा माँग खड़ी हो जाती है। परिणाम — कोई योजना पूरी नहीं हो पाती, और भ्रष्टाचार व सिस्टम की कमियाँ जनता को ही भुगतनी पड़ती हैं।
राशन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, पेयजल, परिवहन — देश के लगभग हर क्षेत्र में यही कहानी है। जितने अस्पताल बनाए जाते हैं, उससे कहीं अधिक मरीज पैदा होते हैं। जितने स्कूल खोले जाते हैं, उससे तेज़ छात्रों की नई फौज पैदा हो जाती है। रोज़गार देने की योजनाएँ आती हैं, लेकिन बेरोज़गारी की दर घटने के बजाय बढ़ती जाती है। यह ऐसा खाई-पाटने वाला खेल हो गया है जहाँ सरकार एक तरफ मेहनत कर रही है और दूसरी तरफ जनसंख्या इसके हर प्रयास को ध्वस्त कर रही है।सरकार कुएँ भर रही है और कोई ऊपर से नल खोलकर लगातार पानी गिरा रहा है। नतीजा — कुआँ कभी भरता ही नहीं। इस सबमें सबसे चिंताजनक बात यह है कि राजनैतिक दल इस मुद्दे पर गंभीर बात करना ही नहीं चाहते। जनसंख्या नियंत्रण अब कोई “सामाजिक मुद्दा” नहीं रहा, बल्कि पूरी तरह “वोट बैंक” में बदल गया है।
हर पार्टी जानती है कि जैसे ही वह “दो बच्चों का कानून” लाने की बात करेगी, किसी न किसी समुदाय की नाराज़गी झेलनी पड़ेगी। वोटों का गणित बिगड़ जाएगा, चुनाव हार सकते हैं। इस डर ने नेताओं की जुबान सिल दी है। देश हित पीछे चला गया, और तुष्टिकरण आगे निकल गया।जिस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा बोलना चाहिए, उसी पर राजनीतिक चुप्पी सबसे ज़्यादा है। सच बोलें तो यह चुप्पी एक राष्ट्रीय अपराध है। आज लगभग 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन पर हैं। यह राहत है या बोझ — सवाल सीधा है। मुफ्त योजनाएँ ऐसी हो गई हैं कि लोग काम करने के बजाय सरकारी सहायता पर ज्यादा निर्भर होने लगे हैं। दुर्भाग्य देखिए — बच्चा पैदा होने पर कुछ राज्यों में उसके परिवार को पैसे तक मिलते हैं। कोई नीति परिवार नियोजन को प्रोत्साहित नहीं कर रही, बल्कि आश्रितता को बढ़ा रही है। बच्चों की संख्या बढ़ने पर मिलने वाले फायदे और मुफ्त सुविधाएँ, समाज को कामगार और आत्मनिर्भर बनाने के बजाय निर्भर और निष्क्रिय बना रही हैं।
भारत में हर साल नए जन्मों की संख्या लगभग 2.3 से 2.5 करोड़ के बीच है। साल 2023 में भारत में लगभग 2.52 करोड़ बच्चों का जन्म हुआ। इसका मतलब रोज़ 63,000 से 67,000 नए नागरिक पैदा हो रहे हैं। ये किसी छोटे देश की कुल आबादी के बराबर है। यह सिर्फ “संख्या” नहीं है, यह दबाव है — अस्पतालों पर, स्कूलों पर, नौकरियों पर, सड़कों पर, बिजली पर, जमीन पर, और पूरे प्रशासनिक तंत्र पर। प्रजनन दर घट रही है, यह सही है — लेकिन कुल जनसंख्या अभी भी बढ़ रही है। क्योंकि बेस लाइन बहुत बड़ी है। देश में पहले से ही 140 करोड़ लोग हैं। हर साल उस पर दो-ढाई करोड़ का नया भार जुड़ जाना मामूली बात नहीं। —
प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला, हर घर नल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, मनरेगा, स्वच्छ भारत, शिक्षा अधिकार कानून (RTE), कौशल विकास योजना — सब उसी दीवार से टकरा रही हैं जिसका नाम है “अतिरिक्त बोझ”।योजनाओं का बजट बढ़ रहा है, लेकिन लाभार्थियों की संख्या उससे तेज़ बढ़ती जा रही है। सरकारी तंत्र हमेशा “कैच-अप” मोड में है, “कंट्रोल” मोड में नहीं।चीन, ईरान, बांग्लादेश, थाईलैंड, इंडोनेशिया सहित दर्जनों देशों ने सीमित संतान नीति (Two Child Policy) जैसी सख्त नीतियाँ लागू कीं।भारत आज भी “जागरूकता”, “परामर्श”, “स्लोगन” और “पोस्टर” के भरोसे चल रहा है।1960 से परिवार नियोजन कार्यक्रम चल रहा है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति (Political Will) कभी नहीं आई ।बेरोज़गारी का ज्वालामुखी फट रहा है। अपराध बढ़ रहा है। पर्यावरण का दम घुट रहा है। पानी, जमीन, जंगल, नदियाँ — सब दबाव झेल रहे हैं। जनसंख्या कोई “धार्मिक”, “जातीय”, “सांस्कृतिक” विवाद नहीं है — यह “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “राष्ट्रीय अस्तित्व” का सवाल है। सिर्फ मुफ्त योजनाएँ देने से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए जरूरी है:दो-बच्चे का कानून, बच्चों की संख्या सीमित रखने वालों को आर्थिक लाभ,ग्रेजुएट से नीचे वालों के लिए कुटुंब नियोजन अनिवार्य परामर्श,गरीबी-रेखा से नीचे वाले परिवारों को दूसरे बच्चे पर कड़ी शर्तें, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार में एक-परिवार-दो-बच्चे की प्राथमिकता, आबादी के आधार पर योजना बजट तय करना । सख्त जनसंख्या नीति के बिना विकास सिर्फ भाषणों और इश्तिहारों में रहेगा, ज़िंदगी में नहीं। जो देश अपनी आबादी को नियंत्रित नहीं रखता, उसका भविष्य उधार के पैसों और मुफ्त योजनाओं में बर्बाद हो जाता है।
प्रदीप फुटेला
वरिष्ठ पत्रकार
संपादक कुमाऊँ केसरी
9690421600


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