जीवन की हर समस्या का समाधान है भगवद्गीता में: आचार्य प्रशांत
लखनऊ। आधुनिक जीवन की उलझनों, और व्यक्ति के आंतरिक संघर्षों के बीच आचार्य प्रशांत ने कहा कि मनुष्य की हर समस्या का मूल समाधान भगवद्गीता के
लखनऊ। आधुनिक जीवन की उलझनों, और व्यक्ति के आंतरिक संघर्षों के बीच आचार्य प्रशांत ने कहा कि मनुष्य की हर समस्या का मूल समाधान भगवद्गीता के बोध में निहित है—लेकिन शर्त यह है कि गीता को कर्मकांड या भावुक आस्था की किताब नहीं, बल्कि आत्म-परीक्षण का औज़ार समझा जाए।
डॉ 0 भीमराव अंबेडकर ऑडिटोरियम में आयोजित संत सरिता सम्मेलन में आचार्य प्रशांत ने कबीर साहब की पंक्ति “खलक सब रैन का सपना, समझ मन कोई नहीं अपना” को आधार बनाते हुए कहा कि अहंकार को यह बात बहुत रास आती है कि “कोई अपना नहीं।” यही अहंकार फिर संसार, रिश्तों, विषयों और संतों तक को झूठा ठहराकर स्वयं को सही साबित करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमने संतों के भजनों और आध्यात्मिक साहित्य के अर्थ अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ दिए हैं—यही सबसे बड़ी आध्यात्मिक बेईमानी है।
आचार्य प्रशांत ने लोकप्रिय सैड सॉन्ग संस्कृति पर भी तीखा प्रहार किया। उनका कहना था कि लगभग हर दुखी गीत एक ही भाव रचता है—“यह दुनिया मेरे काम की नहीं।” यह भाव सुनने में गहरा लगता है, लेकिन असल में यह पलायनवादी अहंकार की अभिव्यक्ति है, जो अपनी अपूर्णता का दोष पूरी दुनिया पर मढ़ देता है।
उन्होंने साफ कहा कि दोष किसी बाबा, नेता या व्यवस्था का नहीं है। हमने स्वयं अज्ञान में सौदे किए हैं—और जब फैसला अज्ञान से होता है, तो परिणाम दुख ही होता है। कोई भी विषय, कोई भी संबंध, कोई भी वस्तु उस स्तर की नहीं होती कि मनुष्य की आंतरिक अपूर्णता को मिटा सके। और जब हम किसी विषय का त्याग या तिरस्कार करते हैं, तो दरअसल प्रकृति माँ का ही अपमान करते हैं।
प्रकृति और समाज के संदर्भ में आचार्य प्रशांत ने जाति-भेद, ऊँच-नीच और छूत-अछूत को सीधा आध्यात्मिक अपराध बताया। उन्होंने कहा—जिस जगह को छूने या जाने से तुम इनकार कर रहे हो, वहीं से हवा आती है और उसी से तुम सांस लेते हो। प्रकृति में कुछ भी अपवित्र नहीं; अपवित्रता हमारे दृष्टिकोण में है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अध्यात्म का काम विषयों का वर्गीकरण करना नहीं है—न यह सिखाना कि किसे भोगो और किसे त्यागो। प्रकृति को न भोगा जाता है, न त्यागा जाता है। अध्यात्म यह देखता है कि चुनने वाला कौन है। यदि किसी विषय में दोष दिखता है, तो दोष विषय में नहीं, उसे चुनने वाले ‘मैं’ में है।
प्रश्नोत्तरी शैली में आचार्य प्रशांत ने कई भ्रांतियों को तोड़ा। उन्होंने कहा कि अध्यात्म इंसान-इंसान की एकता की बात नहीं करता, बल्कि अहंकार और आत्मा की एकता की बात करता है। कौमी या सामाजिक एकता को अध्यात्म के नाम पर पेश करना भ्रामक है। “पिया मोरे जागे मैं कैसे सोई रे” जैसे भजन निजी बोध की बात करते हैं; दूसरों की चर्चा करना उनमें भद्दापन भर देता है।
दुख के प्रश्न पर उनका कथन बेहद सीधा था—तुम्हारे दुख का कारण तुम खुद हो। दूसरा व्यक्ति तुम्हें पीड़ा दे सकता है, नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन भीतर का दुख तुम्हारी सहमति के बिना संभव नहीं। आंतरिक हानि हमेशा स्वीकृति से होती है। सत्य और अहिंसा को उन्होंने किसी विचारधारा से ऊपर बताया। स्वयं को पृथक और विशेष मानना ही हिंसा है। गांधीजी के संदर्भ में उन्होंने कहा कि गांधी को महान बनाने वाली चीज़ केवल सत्य और अहिंसा नहीं, बल्कि उनका आग्रह और संकल्प था—वह जिद कि “मेरे पास साधन नहीं, हथियार नहीं, लेकिन जान तो है; जो सही है वही करूँगा।” अगर कुछ रोक नहीं सकते, तो कम से कम समर्थन करना छोड़ सकते हैं—यही नैतिक साहस है।
आचार्य प्रशांत ने परमार्थ और मृत्यु के संबंध को भी स्पष्ट किया। जिस स्थान पर आध्यात्मिक स्तर पर मुक्ति है, व्यवहारिक स्तर पर वही मृत्यु कहलाती है। मृत्यु पर रोना नहीं, रोने योग्य तो अज्ञान है। जब तक अहंकार जीवित है, तब तक संघर्ष भी रहेगा—और अहंकार पर जो सिद्धांत गढ़े जाते हैं, वे अक्सर उसी अहंकार की उपज होते हैं।
अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने एक कड़वी लेकिन सच्ची बात कही—दुख का इलाज सरल है, लेकिन दुख के मज़े गहरे होते हैं। और इसलिए मनुष्य इलाज नहीं चाहता, कहानी चाहता है। गीता कहानी नहीं, आईना है।


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