क्षणभंगुर जीवन: क्या कल फिर खिलेगी कली? नश्वरता के कोलाहल में शाश्वत प्रेम की पुकार
पत्रकारिता के अपने पांच दशकों के सफर में मैंने अनगिनत 'डेडलाइंस' का सामना किया है। खबरें आती हैं, छपती हैं और अगले ही पल इतिहास बन जाती हैं।
— विजय दीक्षित
(लेखक अमृत बाजार पत्रिका/युगान्तर समूह, कोलकाता के वरिष्ठ संपादक हैं)
पत्रकारिता के अपने पांच दशकों के सफर में मैंने अनगिनत 'डेडलाइंस' का सामना किया है। खबरें आती हैं, छपती हैं और अगले ही पल इतिहास बन जाती हैं। हम पत्रकार अक्सर "ब्रेकिंग न्यूज़" के पीछे भागते हैं, लेकिन इन रोजमर्रा की खबरों के शोर के बीच एक खबर ऐसी है जिसे हम हर दिन अनदेखा करते हैं, जबकि वही हमारे अस्तित्व का सबसे बड़ा सत्य है। वह सत्य है,जीवन की क्षणभंगुरता।
ब्रज की रसिक परंपरा और श्री राधा वल्लभ संप्रदाय का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी सवैया है, जो मात्र एक भजन नहीं, बल्कि मानव जीवन की अनिश्चितता पर एक आध्यात्मिक दस्तावेज है। यह सवैया हमें एक कठोर सत्य का आईना दिखाता है:
"क्षण भंगुर जीवन की कलिका, कल प्रात को जान खिली न खिली।
मलयाचल की शुचि शीतल मंद, सुगंध समीर चली न चली।
कलिकाल कुठार लिये फिरता, तन नम्र पै चोट झिली न झिली।
भजु ले हरिवंश हरि रसना, रजु अंत समय पै हिली न हिली॥"
जीवन का अनिश्चित जुआ
हम भविष्य की योजनाओं में इतने मशगूल हैं कि भूल जाते हैं कि हमारा जीवन पानी के उस बुलबुले या उस नाजुक कली (कलिका) के समान है। सवैया की पहली पंक्ति चेतावनी देती है कि हम आज रात इस उम्मीद में सोते हैं कि कल उठेंगे, लेकिन क्या पता? वह कली जो आज डाल पर है, कल सुबह फूल बनकर खिल भी पाएगी या रात के अंधेरे में ही मुरझा जाएगी?
हम मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित हवाओं (सांसारिक सुखों) के मोह में खोए हैं, लेकिन क्या हम जानते हैं कि हमारे जीवन की यह श्वास (समीर) अगले पल चलेगी या थम जाएगी? सांसों का यह आवागमन कब थम जाए, इसका कोई 'प्रेस रिलीज' पहले जारी नहीं होता।
काल का कुठार और हमारी बेफिक्री
आज का मनुष्य इस मुगालते में जीता है कि उसके पास अभी बहुत समय है। लेकिन अध्यात्म और रसिक संत हमें चेताते हैं कि "कलिकाल कुठार लिये फिरता..." अर्थात, काल (मृत्यु) हाथ में कुल्हाड़ी लेकर अदृश्य रूप से हमारे पीछे चल रहा है। हमारा शरीर, जिसे हम इतना संवारते हैं, वह इतना 'नम्र' (कोमल) है कि काल के एक प्रहार को भी सह नहीं पाएगा। एक ही वार में यह मिट्टी में मिल जाएगा।
राधा-कृष्ण का प्रेम: एकमात्र आश्रय
जब जीवन इतना नश्वर है, तो स्थिरता कहाँ है? इसका उत्तर वृंदावन की गलियों में मिलता है। रसखान जैसे रसिक संतों ने बताया है कि जिस ब्रह्म को वेदों में ढूँढा जाता है, वह प्रेम के वश में होकर ब्रज की कुंज गलियों में श्री राधा जी के चरण दबाते हुए मिलते हैं। यह ईश्वर की 'भक्त-वत्सलता' है।
इसीलिए संत चेतावनी देते हैं— "भजु ले हरिवंश हरि रसना..."। यह एक पुकार है कि अपनी वाणी का उपयोग व्यर्थ के प्रलाप में करने के बजाय उस परम चेतना के स्मरण में करें। अक्सर देखा गया है कि जीवन भर हम बहुत बोलते हैं, तर्क करते हैं, लेकिन अंतिम समय में जब प्राण कंठ में आते हैं, तो वाणी साथ छोड़ देती है।
अभी ही सही समय है
सवैया की अंतिम पंक्ति रोंगटे खड़े कर देती है— "रजु अंत समय पै हिली न हिली।" कौन जाने, अंत समय में यह जीभ (रसना) प्रभु का नाम लेने के लिए हिल भी पाएगी या नहीं?
इसलिए, 'कल' की प्रतीक्षा एक छलावा है। मैं अपने पाठकों से यही साझा करना चाहता हूँ कि जीवन की भागदौड़ और आपाधापी के बीच, थोड़ा समय उस 'शाश्वत' के लिए निकालें। राधा-कृष्ण के चरणों में समर्पित प्रेम ही वह कवच है जो काल के कुठार को निष्प्रभावी कर सकता है। मृत्यु जीवन का अंत कर सकती है, लेकिन प्रेम और भक्ति का नहीं।
आइए, इस क्षणभंगुर जीवन को व्यर्थ की चिंताओं में न गंवाकर, उसे कृष्ण-प्रेम के रंग में रंग दें, ताकि जब जीवन की कली मुरझाए, तो उसकी सुगंध परमात्मा तक पहुँचे।


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