गोत्र सिस्टम:अंधविश्वास नहीं, बल्कि 'जेनेटिक डिसऑर्डर' से बचने का प्राचीन 'वैक्सीन'
कोलकाता : क्या गोत्र केवल शादी-ब्याह में रस्म अदायगी का एक पुराना तरीका है? क्या यह आज के आधुनिक युग में अप्रासंगिक हो चुका है? यदि आप ऐसा सोचते हैं
विजय दीक्षित*
(सीनियर एडिटर, अमृत बाजार पत्रिका, युगान्तर समूह, कोलकाता)
कोलकाता : क्या गोत्र केवल शादी-ब्याह में रस्म अदायगी का एक पुराना तरीका है? क्या यह आज के आधुनिक युग में अप्रासंगिक हो चुका है? यदि आप ऐसा सोचते हैं, तो विज्ञान की यह चेतावनी आपके लिए है। आधुनिक जेनेटिक्स (आनुवंशिकी) ने अब यह सिद्ध कर दिया है कि जिसे हम 'दकियानूसी परंपरा' मानकर छोड़ रहे हैं, वह दरअसल आने वाली पीढ़ियों को गंभीर लाइलाज बीमारियों से बचाने का एक 'सुरक्षा कवच' है।
आज की युवा पीढ़ी अक्सर सवाल करती है कि एक ही गोत्र में शादी क्यों नहीं हो सकती? इसका जवाब धर्मशास्त्रों से पहले अब मेडिकल साइंस दे रहा है।
विज्ञान की चेतावनी:बीमारियों को निमंत्रण
मेडिकल साइंस की भाषा में एक ही गोत्र में विवाह को सम गोत्रिय विवाह माना जा सकता है। विज्ञान का सीधा नियम है,जीन में विविधता ही स्वास्थ्य की गारंटी है। एक ही ब्लड लाइन के दो लोगों के बीच विवाह होता है, तो उनके डीएनए (DNA) में समानता बहुत अधिक होती है। आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार, हमारे शरीर में कई 'रिसेसिव जीन' होते हैं, जिनमें बीमारियाँ छिपी होती हैं। जब अलग-अलग गोत्र (जीन पूल) में शादी होती है, तो ये खराब जीन दब जाते हैं। लेकिन, सगोत्र विवाह में पति और पत्नी दोनों में समान खराब जीन होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे संतान में गंभीर बीमारियाँ उभरकर सामने आती हैं।
सगोत्र विवाह से होने वाले खतरे (साइंटिफिक फैक्ट्स):
आनुवंशिक विकार : थैलेसीमिया (Thalassemia), हीमोफीलिया (रक्त का थक्का न जमना) और सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी बीमारियाँ सगोत्र विवाहों की संतानों में सबसे अधिक पाई जाती हैं।
जन्मजात विकलांगता: शोध बताते हैं कि नजदीकी रिश्तेदारों या एक ही मूल वंश में विवाह से पैदा होने वाले बच्चों में मानसिक मंदता, बहरापन या शारीरिक अपंगता का जोखिम सामान्य बच्चों की तुलना में दोगुना होता है।
इम्युनिटी का अभाव: विज्ञान का 'हाइब्रिड विगर' सिद्धांत कहता है कि जीन जितने विविध होंगे, संतान उतनी ही मजबूत होगी। एक ही गोत्र में विवाह से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर रह जाती है, जिससे वे जल्दी बीमार पड़ते हैं।
वैदिक 'जीनोम' विज्ञान: कबीलों की गायों से शुरू हुआ सफर
अब सवाल उठता है कि हजारों साल पहले जब लैब और माइक्रोस्कोप नहीं थे, तब हमारे ऋषियों ने इसे कैसे समझा? इसका उत्तर वेदों में छिपा है।'गोत्र' शब्द की जड़ें ऋग्वेद और अथर्ववेद में मिलती हैं। यह व्यवस्था उस दौर के 'सोशल इंजीनियरिंग' और 'बायोलॉजिकल साइंस' का अद्भुत मिश्रण थी।
शाब्दिक अर्थ: 'गोत्र' शब्द 'गो' (गाय) और 'त्र' (त्राण/रक्षण) से बना है। प्राचीन काल में संपत्ति का मानक 'गाय' थी। जिन परिवारों या कबीलों की गायें एक ही बाड़े (गोष्ठ) में बंधती थीं, उनका खान-पान और वातावरण एक जैसा होता था।
रक्त संबंध की पहचान: धीरे-धीरे यह 'एक साथ रहने वाले समूह' की पहचान बन गया। ऋषियों ने समझा कि एक ही समूह में विवाह करने से नस्ल कमजोर हो रही है। अतः उन्होंने 'गोत्र' को ऋषियों के नाम (सप्तर्षि—विश्वामित्र, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप, जमदग्नि और अगस्त्य) से जोड़कर वंशावली तय कर दी, ताकि यह पता चल सके कि कौन किस मूल डीएनए का वाहक है।
युवाओं के लिए विश्लेषण: लाभ-हानि का गणित
आज के कॉर्पोरेट और तकनीकी युग में जीने वाले युवाओं को यह समझना होगा कि गोत्र प्रणाली कोई पाखंड नहीं, बल्कि 'रिस्क मैनेजमेंट' है।
नुकसान: गोत्र न मानकर विवाह करने का अर्थ है,अपने बच्चों के भविष्य के साथ जुआ खेलना। इसमें संतान के अस्वस्थ होने या पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली बीमारियों के ट्रांसफर होने का खतरा 100% तक बढ़ जाता है।
लाभ: गोत्र सिस्टम का पालन करने से 'जेनेटिक डायवर्सिटी' बनी रहती है। वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि अलग जीन पूल से आई संतानें अधिक बुद्धिमान (High IQ), रचनात्मक और शारीरिक रूप से सुदृढ़ होती हैं।
परंपरा में ही सुरक्षा
हमारी सनातन परंपरा में विवाह को केवल दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो भिन्न जीन-पूल का मिलन माना गया है। अथर्ववेद के मंत्रों से लेकर आधुनिक डीएनए टेस्ट तक, बात एक ही साबित होती है— नस्ल की शुद्धता और सुरक्षा।
अतः, गोत्र पूछना पिछड़ापन नहीं है। यह सुनिश्चित करना है कि आपकी आने वाली पीढ़ी अस्पताल के चक्कर काटने के बजाय एक स्वस्थ और गौरवशाली जीवन जिए। यह ऋषियों द्वारा मानव जाति को सौंपा गया सबसे बड़ा वैज्ञानिक उपहार है।


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