UGC नीतियों को लेकर देशभर में छात्रों का असंतोष, कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन

नई दिल्ली। देशभर में  (UGC) से जुड़ी नीतियों को लेकर छात्रों और अभ्यर्थियों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। विभिन्न राज्यों में विश्वविद्यालय परिसरों, छात्र संगठनों

UGC नीतियों को लेकर देशभर में छात्रों का असंतोष, कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन

नई दिल्ली। देशभर में  (UGC) से जुड़ी नीतियों को लेकर छात्रों और अभ्यर्थियों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। विभिन्न राज्यों में विश्वविद्यालय परिसरों, छात्र संगठनों और सामाजिक मंचों पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उच्च शिक्षा, शोध और नियुक्तियों से संबंधित मौजूदा ढाँचे में पारदर्शिता और संतुलन की कमी है, जिसका असर विशेष रूप से सामान्य वर्ग के छात्रों पर पड़ रहा है।
विरोध कर रहे छात्रों का तर्क है कि देश में उच्च शिक्षा की सीटें सीमित हैं, जबकि प्रतियोगिता लगातार बढ़ रही है। आरक्षण व्यवस्था के कारण खुली श्रेणी की सीटों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती जा रही है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को अधिक अंक और बेहतर रैंक होने के बावजूद प्रवेश न मिलने की स्थिति का सामना करना पड़ता है। कई छात्र संगठनों ने यह मुद्दा उठाया है कि कट-ऑफ में यह अंतर मानसिक दबाव और असंतोष को जन्म दे रहा है।
सामान्य वर्ग के छात्रों की एक प्रमुख आशंका यह भी है कि छात्रवृत्ति, शोध फेलोशिप और विशेष शैक्षणिक सहायता योजनाओं में उनके लिए विकल्प सीमित हैं। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के छात्र न तो आरक्षण के दायरे में आते हैं और न ही पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त कर पाते हैं, जिससे उनकी शिक्षा बीच में छूटने का खतरा बढ़ जाता है। इसी संदर्भ में कई जगह आर्थिक आधार पर सहायता और आरक्षण की मांग भी उठ रही है।
प्रदर्शनकारियों द्वारा यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि अन्य वर्गों के लिए जहां संवैधानिक और वैधानिक आयोग मौजूद हैं, वहीं सामान्य वर्ग के हितों और समस्याओं पर विचार करने के लिए कोई समर्पित आयोग नहीं है। इससे यह भावना मजबूत हो रही है कि नीति निर्माण की प्रक्रिया में उनकी समस्याएं संगठित रूप से दर्ज नहीं हो पातीं।
हालांकि, शिक्षा विशेषज्ञों और सामाजिक न्याय से जुड़े जानकारों का कहना है कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को समान अवसर प्रदान करना है और इसे इस पृष्ठभूमि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में नीतियों की समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है, ताकि किसी भी वर्ग में असंतोष न पनपे।
UGC की ओर से फिलहाल इन विरोध प्रदर्शनों को लेकर कोई ठोस नीति परिवर्तन की घोषणा नहीं की गई है। आयोग का पक्ष यह रहा है कि वह केंद्र सरकार और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप कार्य करता है।
फिलहाल, देशभर में हो रहा यह विरोध इस बात का संकेत है कि उच्च शिक्षा व्यवस्था में संतुलन, पारदर्शिता और संवाद की आवश्यकता बढ़ गई है। सामान्य वर्ग के छात्रों की आशंकाओं के साथ-साथ सामाजिक न्याय के उद्देश्यों को साधने की चुनौती अब नीति-निर्माताओं के सामने स्पष्ट रूप से खड़ी है।