भारत में बाएं ओर वाहन चलाने की व्यवस्था: परंपरा, व्यावहारिकता और वर्तमान
भारत में सड़कों पर वाहन बाईं ओर चलाए जाते हैं। यह व्यवस्था अक्सर सामान्य मानी जाती है, लेकिन इसके पीछे इतिहास, प्रशासनिक निर्णय और व्यावहारिक
भारत में सड़कों पर वाहन बाईं ओर चलाए जाते हैं। यह व्यवस्था अक्सर सामान्य मानी जाती है, लेकिन इसके पीछे इतिहास, प्रशासनिक निर्णय और व्यावहारिक तर्कों का लंबा सिलसिला है। आज जब सड़क दुर्घटनाओं, ट्रैफिक अव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मानकों की चर्चा होती है, तब यह सवाल फिर उभरता है कि भारत में बाईं ओर वाहन चलाने की परंपरा कितनी तर्कसंगत और प्रासंगिक है।
भारत में बाईं ओर ड्राइविंग की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई। ब्रिटेन में घुड़सवारी और सैन्य परंपराओं के कारण बाईं ओर चलना सुविधाजनक माना जाता था। उसी प्रणाली को भारत में भी लागू किया गया। रेलवे, सड़कें और ट्रैफिक नियम उसी ढांचे पर विकसित हुए। आज भी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में बाईं ओर ही वाहन चलते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह कोई पिछड़ी या अव्यवहारिक व्यवस्था नहीं है।
स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने यह विकल्प था कि वह चाहें तो ड्राइविंग साइड बदल सकता है, लेकिन ऐसा करना न तो सुरक्षित था और न ही व्यावहारिक। पूरे देश का सड़क ढांचा, वाहन निर्माण, सिग्नल सिस्टम और ड्राइविंग प्रशिक्षण पहले से बाईं ओर के अनुरूप था। इसे बदलने का अर्थ होता—भारी आर्थिक बोझ और बड़े पैमाने पर दुर्घटनाओं का खतरा। इसलिए नीति-निर्माताओं ने निरंतरता को प्राथमिकता दी।
वास्तविक समस्या ड्राइविंग साइड नहीं, बल्कि अनुशासन और नियमों के पालन की है। चाहे वाहन बाईं ओर चलें या दाईं ओर—यदि लेन अनुशासन, गति नियंत्रण और ट्रैफिक नियमों का पालन न हो, तो दुर्घटनाएँ होना तय है। भारत में सड़क सुरक्षा की चुनौतियाँ अधिकतर अव्यवस्थित ट्रैफिक, ओवरटेकिंग की गलत आदतों, पैदल यात्रियों की अनदेखी और कमजोर प्रवर्तन से जुड़ी हैं, न कि ड्राइविंग साइड से।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में निर्मित वाहन, स्टीयरिंग पोज़िशन और ड्राइविंग प्रशिक्षण पूरी तरह बाईं ओर की व्यवस्था के अनुरूप हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि ड्राइविंग साइड बदलने से सुरक्षा में कोई स्वतः सुधार नहीं होता, बल्कि नियमों का कड़ाई से पालन और सड़क अवसंरचना का सुधार ही वास्तविक समाधान है।


News Desk 

