देवभूमि की जनता हर संघर्ष में पहाड़ की तरह अडिग
देवभूमि… यह शब्द सुनते ही आंखों के सामने बर्फ से ढकी चोटियाँ, घंटियों की ध्वनि और आस्था की लहरें तैरने लगती हैं। लेकिन अगर ईमानदारी से देखें तो उत्तराखंड की
प्रदीप फुटेला
देवभूमि… यह शब्द सुनते ही आंखों के सामने बर्फ से ढकी चोटियाँ, घंटियों की ध्वनि और आस्था की लहरें तैरने लगती हैं। लेकिन अगर ईमानदारी से देखें तो उत्तराखंड की असली ताकत न तो केवल मंदिर हैं, न पर्यटन, न प्राकृतिक सौंदर्य। इस धरती की असली शक्ति है—पहाड़ की जनता। वह जनता जो हर संघर्ष में पहाड़ की तरह अडिग खड़ी रहती है।
यहाँ जीवन कोई आसान सफर नहीं है। दुर्गम रास्ते, सीमित संसाधन, मौसम की कठोरता, रोज़गार की कमी और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ—ये सब यहाँ के लोगों के लिए रोजमर्रा की सच्चाई हैं। फिर भी, यह समाज टूटता नहीं। झुकता नहीं। परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, पहाड़ का इंसान खड़ा रहता है—शांत, धैर्यवान और जिद्दी।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, मगर अटूट हौसला
उत्तराखंड का अधिकतर भूभाग पर्वतीय है। गाँव दूर-दूर बसे हैं, कई स्थानों तक आज भी सड़कें पूरी तरह नहीं पहुँच पाई हैं। महिलाएँ रोज़ कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी और लकड़ी लाती हैं। किसान सीढ़ीनुमा खेतों में खेती करते हैं जहाँ मशीनों की पहुँच नहीं।
यहाँ की खेती लाभ का बड़ा सौदा नहीं, बल्कि अस्तित्व की जिद है। कम उपज, सीमित बाजार और अनिश्चित मौसम—सब कुछ चुनौती है। लेकिन किसान खेत छोड़कर भाग नहीं रहा। वह अपने पहाड़ से जुड़ा हुआ है।
पहाड़ की जनता का यह स्वभाव पुरानी परंपराओं से आया है—कम में संतोष, श्रम में सम्मान और सामूहिकता में ताकत। 1970 के दशक में जब जंगलों की अंधाधुंध कटाई शुरू हुई, तो पहाड़ की महिलाओं ने इतिहास रच दिया। उन्होंने पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से रोका। यही आंदोलन बाद में “चिपको आंदोलन” के नाम से विश्वभर में जाना गया।
इस आंदोलन में सुंदरलाल बहुगुणा जैसे पर्यावरणविदों की भूमिका रही, लेकिन असली नेतृत्व ग्रामीण महिलाओं ने किया। उन्होंने दिखाया कि जंगल सिर्फ लकड़ी का स्रोत नहीं—जीवन का आधार हैं।
यह घटना बताती है कि पहाड़ की जनता सिर्फ सहनशील नहीं, जागरूक भी है। वह अपने हक और अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए खड़ी होना जानती है।
आपदाओं में भी अडिग
उत्तराखंड आपदाओं का प्रदेश भी कहा जाता है। भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़—ये सब यहाँ की नियति जैसे बन गए हैं। 2013 की भीषण त्रासदी में केदारनाथ मंदिर क्षेत्र ने भारी विनाश देखा।
लेकिन उस समय भी सबसे पहले मदद के लिए कौन आगे आया? स्थानीय लोग। उन्होंने अपने घर खोले, यात्रियों को बचाया, राहत कार्य में हिस्सा लिया।
यहाँ का समाज संकट में सरकार का इंतजार नहीं करता—वह खुद मोर्चा संभालता है। यही असली ताकत है।
सेना और राष्ट्र सेवा में योगदान
उत्तराखंड का नाम सेना में सबसे अधिक योगदान देने वाले राज्यों में लिया जाता है। सीमाओं पर तैनात हजारों जवान इसी पहाड़ की मिट्टी से निकले हैं।
यह परंपरा नई नहीं है। पहाड़ का युवक कठिन जीवन का आदी होता है। अनुशासन, सहनशीलता और साहस यहाँ के संस्कार हैं। यही कारण है कि सेना में उसकी उपस्थिति मजबूत है।
राष्ट्र सेवा के प्रति यह समर्पण भी पहाड़ की जनता की सामूहिक चेतना को दर्शाता है।
पलायन: दर्द और दृढ़ता
एक सच्चाई यह भी है कि उत्तराखंड के सैकड़ों गाँव खाली हो चुके हैं। रोज़गार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में युवा मैदानों की ओर जा रहे हैं। यह पलायन पहाड़ की सबसे बड़ी चुनौती है।
लेकिन जो लोग बचे हैं, वे हार मानने को तैयार नहीं। महिलाएँ स्वयं सहायता समूह बना रही हैं, युवा पर्यटन और जैविक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
यह संघर्ष चुपचाप चल रहा है—बिना शोर, बिना प्रचार। लेकिन यही असली जज्बा है।
संस्कृति: सामूहिकता की ताकत
गढ़वाली और कुमाऊँनी लोकगीतों में सिर्फ मनोरंजन नहीं, जीवन का दर्शन है। त्योहार, मेले, नंदा देवी राजजात यात्रा—ये सब सामाजिक एकता के प्रतीक हैं।
यहाँ समाज अभी भी “हम” से चलता है। किसी के घर दुख हो तो पूरा गाँव साथ खड़ा होता है। शादी-ब्याह में सामूहिक श्रम होता है।
यह सामूहिकता ही संकट में ढाल बनती है।
चेतना और सवाल
लेकिन एक कड़वा सच भी है—जनता की सहनशीलता को उसकी मजबूरी समझ लिया जाता है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूल सुविधाएँ आज भी कई क्षेत्रों में अधूरी हैं।
पहाड़ की जनता मजबूत है, पर इसका मतलब यह नहीं कि उसे हर बार परीक्षा में डाला जाए।
विकास ऐसा होना चाहिए जो प्रकृति के अनुकूल हो। अंधाधुंध निर्माण, अवैज्ञानिक परियोजनाएँ और संसाधनों का दोहन अंततः इसी जनता को नुकसान पहुँचाता है।
महिला शक्ति: रीढ़ की हड्डी
उत्तराखंड की महिलाओं की भूमिका विशेष उल्लेखनीय है। पुरुषों के पलायन के बाद खेती, परिवार और समाज की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है।
वे खेत जोतती हैं, बच्चों को पढ़ाती हैं, जलावन लाती हैं और सामाजिक आयोजनों में नेतृत्व भी करती हैं।
अगर देवभूमि खड़ी है, तो उसकी रीढ़ पहाड़ की महिला है।
पहाड़ की सबसे बड़ी खासियत क्या है? वह शोर नहीं करता। वह बस खड़ा रहता है—मजबूती से, धैर्य से।
ठीक वैसे ही यहाँ की जनता है। न ज्यादा शिकायत, न ज्यादा प्रदर्शन। बस संघर्ष, श्रम और आत्मसम्मान।
देवभूमि की असली ताकत न सिर्फ उसकी प्राकृतिक सुंदरता है, न सिर्फ उसकी धार्मिक पहचान। उसकी असली ताकत वह समाज है जो विपरीत परिस्थितियों में भी टूटता नहीं।
अगर भविष्य सुरक्षित करना है, तो इस जनता की ताकत को पहचानना और सम्मान देना होगा। विकास योजनाएँ उनकी जरूरतों के अनुरूप बनानी होंगी।
क्योंकि सच यही है—जब तक पहाड़ की जनता खड़ी है, तब तक देवभूमि की पहचान अटूट है।
और इतिहास गवाह है—यह जनता हर बार, हर संघर्ष में, पहाड़ की तरह अडिग खड़ी रही है… और आगे भी रहेगी।


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