सीता का कालातीत सफर: मूक त्याग से सशक्त आत्म-निर्णय तक की महागाथा

लखनऊ/कोलकाता: भारतीय साहित्य और पौराणिक कथाएं केवल प्राचीन कहानियां नहीं हैं, बल्कि वे हमारे समाज की नैतिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का दर्पण हैं।

सीता का कालातीत सफर: मूक त्याग से सशक्त आत्म-निर्णय तक की महागाथा

विजय दीक्षित, 
*सीनियर एडिटर,अमृत बाजार पत्रिका/जुगांतर समूह, कोलकाता-

लखनऊ/कोलकाता: भारतीय साहित्य और पौराणिक कथाएं केवल प्राचीन कहानियां नहीं हैं, बल्कि वे हमारे समाज की नैतिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का दर्पण हैं। हाल ही में वनस्थली विद्यापीठ की शोधकर्ता तरुषी देव और अनन्या तिलावत द्वारा प्रस्तुत शोध पत्र 'चित्रा बनर्जी दिवाकरुनी की सीता और जनमानस की सीता का एक तुलनात्मक अध्ययन' इस दिशा में एक नई और गंभीर बहस छेड़ता है। यह लेख सदियों से चली आ रही सीता जी की उस छवि का विश्लेषण करता है जो 'मूक सहनशीलता' से शुरू होकर 'सशक्त विद्रोह' तक पहुँचती है।
वहीं,मेरा मानना है कि साहित्य में सीता के चरित्र का यह बदलता स्वरूप भारतीय महिलाओं की बदलती सामाजिक स्थिति का प्रतीक है।

1. आदर्श' की वेदी पर मूक बलिदान

शोधकर्ता तरुषी देव अपने अध्ययन में बताती हैं कि तुलसीदास जी द्वारा रचित 'रामचरितमानस' (16वीं शताब्दी) ने सीता जी को एक 'आदर्श पत्नी' (पतिव्रता) के रूप में स्थापित किया, जो वफादार, धैर्यवान और कष्टों को चुपचाप सहने वाली हैं।
 * सौंदर्य का बोझ: तुलसीदास सीता की सुंदरता की तुलना सरस्वती, भवानी और लक्ष्मी जैसी देवियों से करते हैं, लेकिन उन्हें एक ऐसे ऊँचे पायदान पर खड़ा कर देते हैं जहाँ वे एक वास्तविक महिला के बजाय केवल एक 'प्रतिमा' नजर आती हैं।
 * सीखी हुई लाचारी : शोध पत्र के अनुसार, बचपन से ही उन्हें सेवा और आज्ञाकारिता की शिक्षा दी गई, जिससे उनमें एक मनोवैज्ञानिक 'लाचारी' विकसित हुई। जब राम उन्हें वनवास के दौरान घर रुकने की सलाह देते हैं, तो उनका एकमात्र तर्क 'राम का साथ' होता है, न कि उनका अपना स्वतंत्र अस्तित्व।
 * पितृसत्तात्मक दृष्टि: यहाँ स्त्री को अक्सर 'माया' या 'मोह' का केंद्र बताया गया है, जो पुरुष की आध्यात्मिक यात्रा में बाधक है।

2. प्राचीन ग्रंथों की गहराई

हालांकि तुलसीदास ने सीता को 'कोमल' दिखाया, लेकिन विजय दीक्षित बताते हैं कि वाल्मीकि रामायण और दक्षिण भारत की कंबन (कब्बन) रामायण में सीता जी के चरित्र में अधिक मानवीय गरिमा और सक्रियता दिखाई देती है।
 * वाल्मीकि रामायण: तुलसीदास के सुखद अंत के विपरीत, वाल्मीकि रामायण का अंत अत्यंत मार्मिक और दुखद है। शोध पत्र यह सुझाव देता है कि मूल वाल्मीकि पाठ में सीता उतनी 'निष्क्रिय' नहीं थीं, जितना बाद के मध्यकालीन कवियों ने उन्हें चित्रित किया।
 * कंबन रामायण: कंबन की रामायण में सीता का चरित्र और अधिक निखर कर आता है, जहाँ उनकी पवित्रता के साथ-साथ उनके आत्मसम्मान को भी विशेष स्थान दिया गया है।

3. द फॉरेस्ट ऑफ एनचेंटमेंट्स

सीता का आधुनिक विद्रोह। मूल शोधकर्ता तरुषी देव इस बात पर जोर देती हैं कि चित्रा बनर्जी दिवाकरुनी की रचना 'द फॉरेस्ट ऑफ एनचेंटमेंट्स' (2019) इस कथा को पूरी तरह बदल देती है। यहाँ सीता जी 'मूक' नहीं हैं, बल्कि एक 'मुखर' महिला हैं।
 * अशोक वाटिका में प्रतिरोध: यहाँ सीता केवल राम के आने का इंतजार नहीं करतीं। वे मानसिक रूप से 'आत्मरक्षा' का अभ्यास करती हैं और रावण के विरुद्ध युद्ध की रणनीतियां बनाती हैं।
 * नेतृत्व और राजनीति: उन्हें एक ऐसी महिला के रूप में दिखाया गया है जो शासन और नेतृत्व की क्षमता रखती थीं, लेकिन समाज की रूढ़ियों ने उन्हें कभी राजा नहीं बनने दिया।

4.आत्मसम्मान की अंतिम पुकार

अग्नि परीक्षा का प्रसंग दोनों ग्रंथों में सबसे अधिक विवादास्पद है।
 * परंपरा: रामचरितमानस में सीता इसे अपनी शुद्धता साबित करने के एक माध्यम के रूप में चुपचाप स्वीकार कर लेती हैं।
 * विद्रोह: दिवाकरुनी की सीता दूसरी बार अग्नि परीक्षा देने से साफ इनकार कर देती हैं। वे कहती हैं, "यदि मैं आज इसे स्वीकार करती हूँ, तो आने वाली सदियों में हर निर्दोष बेटी को इसी तरह खुद को साबित करने के लिए मजबूर किया जाएगा"। यह उनकी हार नहीं, बल्कि उनकी स्वतंत्रता  का क्षण है।

5. भविष्य का निर्माण

परित्याग के बाद अकेले लव और कुश का पालन-पोषण करना सीता जी के कष्टों की पराकाष्ठा थी। शोध पत्र के अनुसार, सीता ने अपने बेटों को बिना किसी कड़वाहट के 'अच्छे पुरुष' के रूप में पाला, जो महिलाओं का सम्मान करना जानते हों। उन्होंने सुनिश्चित किया कि उनके बच्चे अयोध्या के उन नियमों से दूर रहकर पले, जहाँ महिलाओं की गरिमा को दांव पर लगाया जाता था।