परिणाम की परवाह किए बिना भी बेहतर जीवन संभव: आचार्य प्रशांत

ग्रेटर नोएडा। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में आयोजित महाशिवरात्रि महोत्सव इस वर्ष आध्यात्मिकता, आत्ममंथन और संवाद का अनूठा संगम बन गया।

परिणाम की परवाह किए बिना भी बेहतर जीवन संभव: आचार्य प्रशांत

ग्रेटर नोएडा। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में आयोजित महाशिवरात्रि महोत्सव इस वर्ष आध्यात्मिकता, आत्ममंथन और संवाद का अनूठा संगम बन गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आचार्य प्रशांत ने शिवत्व को जीवन की गहराइयों से जोड़ते हुए कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि जागरण की बात है जो मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है।

कार्यक्रम की शुरुआत एक प्रतीकात्मक नाट्य प्रस्तुति से हुई। मंच पर आचार्य प्रशांत ने एक सामान्य व्यक्ति की भूमिका निभाई, जो सामाजिक अपेक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और निजी असुरक्षाओं के बीच उलझा हुआ है। कहानी में दिखाया गया कि बाहरी उपलब्धियाँ लगातार बढ़ती जाती हैं, पर भीतर की बेचैनी कम नहीं होती। चरम दृश्य में पात्र स्वयं से प्रश्न करता है—“क्या मैं वही हूँ जो दुनिया देखती है, या वह जो भीतर छिपा है?” इस संवाद ने पूरे सभागार को कुछ क्षणों के लिए मौन कर दिया। तालियों की गूंज के बीच एक गहरी आत्मचिंतन की अनुभूति स्पष्ट थी।

अपने संबोधन में आचार्य प्रशांत ने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना है। उनके अनुसार शिवत्व चेतना की पराकाष्ठा है—वह स्थिति जहाँ व्यक्ति अपने अहंकार को पहचान लेता है। उन्होंने कहा, “अहंकार का विलाप ही शिवत्व है।” उनका तर्क था कि जब तक मनुष्य अपने दुखों का कारण बाहरी परिस्थितियों में ढूंढता रहेगा, तब तक वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। समस्या बाहर नहीं, दृष्टि में है।

युवाओं से संवाद करते हुए उन्होंने पूछा—“क्या हम जीवन को परिणामों के तराजू पर तौल रहे हैं, या सत्य की कसौटी पर?” उनका कहना था कि आज का युवा सफलता और उपलब्धियों की दौड़ में इतना उलझ गया है कि जीवन की गुणवत्ता को भूल बैठा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बेहतर जीवन परिणामों की चिंता से नहीं, बल्कि सही कर्म और सजगता से आता है। यदि कर्म शुद्ध है, तो परिणाम अपने आप गौण हो जाता है।

उन्होंने शरीर, पहचान और सामाजिक छवि के प्रति अत्यधिक आसक्ति को अहंकार का सूक्ष्म रूप बताया। उनके अनुसार आध्यात्मिकता को बाहरी वेशभूषा, प्रतीकों या अनुष्ठानों में सीमित कर देना उसे पाखंड में बदल देता है। उन्होंने कहा कि प्रतीकों और परंपराओं की अपनी ऐतिहासिक भूमिका रही है, पर आज आवश्यकता उनके मर्म को समझने की है। यदि भीतर समता और सजगता नहीं है, तो बाहरी भव्यता अर्थहीन है।

आचार्य प्रशांत ने यह भी कहा कि अधिकांश दुख स्वनिर्मित होते हैं। बाहरी घटनाएँ केवल परिस्थितियाँ देती हैं, पर प्रतिक्रिया हमारी समझ से निर्धारित होती है। “सत्य आग की तरह है—वह असुविधाजनक हो सकता है, पर शुद्ध करता है,” उन्होंने कहा। यदि व्यक्ति अपने भीतर के झूठ को देखने का साहस कर ले, तो परिवर्तन स्वतः आरंभ हो जाता है। उन्होंने समता में खड़े होकर कर्म करने को ही सच्चा योग बताया।

कार्यक्रम में प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने करियर, असफलता, संबंधों और जीवन के उद्देश्य जैसे विषयों पर प्रश्न पूछे। आचार्य प्रशांत ने प्रत्येक प्रश्न का उत्तर जीवन की वास्तविकता से जोड़ते हुए दिया और युवाओं को आत्मनिर्भर चिंतन की प्रेरणा दी। सत्र के अंत में बुक साइनिंग कार्यक्रम हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में छात्रों और शिक्षकों ने भाग लिया।

आचार्य प्रशांत एक प्रसिद्ध लेखक, दार्शनिक और प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। वे आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र रहे हैं। अद्वैत वेदांत और विश्व बोध साहित्य की शिक्षाओं को आधुनिक जीवन से जोड़ने के लिए वे जाने जाते हैं। उनकी चर्चित पुस्तक “Truth Without Apology” राष्ट्रीय स्तर पर सराही गई है और अब तक उनकी 160 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।