उत्तराखंड में हो रही है नफरत की राजनीति, चुनाव से पहले बढ़ता ध्रुवीकरण चिंता का विषय
देहरादून। उत्तराखंड में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीति का स्वर बदलता जा रहा है। विकास, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसे बुनियादी मुद्दों से
देहरादून। उत्तराखंड में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीति का स्वर बदलता जा रहा है। विकास, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसे बुनियादी मुद्दों से हटकर सियासत अब नफरत और ध्रुवीकरण की राह पर बढ़ती दिख रही है। राजनीतिक बयानबाज़ी, सोशल मीडिया अभियानों और सार्वजनिक मंचों पर दिए जा रहे भाषणों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल बढ़ा है, जो समाज को जोड़ने के बजाय बाँटने का काम कर रही है।
राज्य की राजनीति में इन दिनों धर्म, जाति और पहचान के नाम पर माहौल गरमाया हुआ है। आरोप-प्रत्यारोप का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि अब वैचारिक असहमति की जगह एक-दूसरे को देशद्रोही, असंस्कारी या धर्मविरोधी ठहराने की कोशिशें की जा रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह रणनीति मतदाताओं को वास्तविक मुद्दों से भटकाने के लिए अपनाई जा रही है।
सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी पर विपक्ष आरोप लगा रहा है कि वह धर्म और पहचान की राजनीति के ज़रिये वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है, वहीं विपक्षी दल कांग्रेस पर भी यह आरोप लग रहे हैं कि वह सत्ता विरोधी माहौल को भुनाने के लिए कई बार तीखी और भड़काऊ बयानबाज़ी से पीछे नहीं हट रही। नतीजा यह है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब नीति और कार्यक्रमों की नहीं, बल्कि नफरत की भाषा की हो गई है।
सोशल मीडिया इस पूरी राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। अपुष्ट वीडियो, आधे-अधूरे तथ्य और भ्रामक संदेशों के ज़रिये लोगों की भावनाओं को उकसाया जा रहा है। खास तौर पर युवाओं को निशाना बनाकर ऐसे कंटेंट फैलाए जा रहे हैं, जो समाज में अविश्वास और डर का माहौल पैदा करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इस पर लगाम नहीं लगी, तो इसके सामाजिक परिणाम लंबे समय तक झेलने पड़ सकते हैं।
देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की पहचान हमेशा से सहिष्णुता, आपसी सौहार्द और सांस्कृतिक संतुलन की रही है। लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह पहचान खतरे में दिख रही है। सवाल यह उठता है कि क्या सत्ता की चाह में समाज की एकता को दांव पर लगाया जाना जायज़ है?
आम जनता के बीच भी इस माहौल को लेकर बेचैनी बढ़ रही है। लोग पूछ रहे हैं कि जब पहाड़ों से लगातार पलायन हो रहा है, युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा, स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति बदहाल है, तब राजनीति का फोकस इन मुद्दों पर क्यों नहीं है? क्यों हर चुनाव में समाज को बांटने वाले मुद्दे ही सबसे आगे रखे जाते हैं?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नफरत की राजनीति अल्पकाल में भले ही किसी दल को फायदा पहुंचा दे, लेकिन दीर्घकाल में यह लोकतंत्र और सामाजिक ताने-बाने दोनों को कमजोर करती है। उत्तराखंड के लिए यह वक्त तय करने का है कि उसे भावनाओं से संचालित राजनीति चाहिए या फिर मुद्दों और समाधान पर आधारित नेतृत्व।
आने वाले चुनाव यह साफ़ कर देंगे कि जनता नफरत की भाषा को स्वीकार करती है या फिर एक बार फिर यह संदेश देती है कि देवभूमि को विभाजन नहीं, विवेक की राजनीति चाहिए।


News Desk 

