सरकारी खरीद केंद्रों पर धान तुल जाने से मंडी में पसरा सन्नाटा, आढ़तियों की चिंता बढ़ी

गदरपुर। सरकार कहती है किसानों को लाभ मिलेगा, पर असल में निजी मंडियों को बंद करने की तैयारी है।आढ़ती आज सबसे बड़े संकट में हैं,काम बंद, दुकानें खाली, खर्च बढ़ा

सरकारी खरीद केंद्रों पर धान तुल जाने से मंडी में पसरा सन्नाटा, आढ़तियों की चिंता बढ़ी

जब आमदनी नहीं होगी तो दुकान का किराया कैसे देंगे?

 गदरपुर। सरकार कहती है किसानों को लाभ मिलेगा, पर असल में निजी मंडियों को बंद करने की तैयारी है।आढ़ती आज सबसे बड़े संकट में हैं,काम बंद, दुकानें खाली, खर्च बढ़ा…और ऊपर से सिर्फ डेढ़ प्रतिशत कमीशन!पंजाब-हरियाणा में आढ़ती व्यवस्था पर पूरा सिस्टम चलता है, उत्तराखंड में उसी व्यवस्था को क्यों नहीं लागू किया जाता। सरकार किसानों की बात करती है,मगर उनसे व्यापार करने वाली व्यवस्था को ही कमज़ोर कर रही है।आढ़ती व्यापार का हिस्सा  ही नहीं, बल्कि इस मंडी-व्यवस्था की रीढ़ है। धान खरीफ सीजन निकल गया, इस बार कामकाज इतना घटा है कि कई आढ़ती दुकान का किराया कैसे देंगे—इस सवाल से भी जूझ रहे हैं। उनकी मानें तो विगत वर्षों की तुलना में इस बार आधा भी व्यापार नहीं हो सका। निजी मंडियों की जगह सरकारी खरीद केंद्रों के सक्रिय होने से आढ़तियों के कारोबार को सीधा झटका लगा है।

मंडी के वरिष्ठ आढ़तियों का कहना है कि सरकार की मौजूदा नीतियाँ उनके हितों के प्रतिकूल हैं। “काम नहीं हुआ, पैसा नहीं आया, तो किराया कहाँ से निकलेगा?”, कई व्यापारियों की यही व्यथा है। सरकारी खरीद केंद्रों पर धान तुल जाने से किसानों की सीधे सरकारी कांटों पर लाइन लगी रही, जबकि पारंपरिक मंडियाँ खाली पड़ी रही ।

आढ़तियों ने बताया कि पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों में खरीद आढ़तियों के माध्यम से होती है, जहाँ ढाई प्रतिशत तक कमीशन निर्धारित है। लेकिन उत्तराखंड में मात्र 1.5% कमीशन मिलता है,  मंडियों में व्यापारी यह भी कह रहे हैं कि सरकारी सिस्टम किसानों और आढ़ती—दोनों को भ्रम में डाल रहा है।   मंडी भाव तथा सरकारी भाव में इस वर्ष काफी अंतर रहा जिसकी वजह से किसानों ने सरकारी क्रय केंद्रों पर दवाब बनाकर अपना धान तुलवा लिया,उन्हें लगा कि सरकारी केंद्र बेहतर हैं, जबकि असल में वहाँ भुगतान, तुलाई, ग्रेडिंग और समय—सब कुछ अनिश्चित रहता है। कई किसानों ने भी निजी तौर पर माना कि मंडियों में तुलाई तेज और भुगतान तुरंत मिल जाता था, लेकिन इस बार सिस्टम बदलने से दिक्कतें बढ़ी हैं।

व्यापारियों का कहना है कि पिछले वर्षों में इसी समय मंडी में रौनक देखने को मिलती थी। दुकान पर धान आता था  मजदूरो का भी काम चलता था । लेकिन इस बार पूरा माहौल ठंडा पड़ा रहा है। बीच सीजन में ही दुकानें खाली पड़ी थी, और किराया, मजदूरी, बिजली, स्टाफ—सब पर खर्च जारी है।

आढ़ती एसोसिएशन अध्यक्ष अशोक हुंडिया ने कहा कि  यदि सरकार अपनी नीति में सुधार नहीं करती तो राज्य में निजी ट्रेडिंग लगभग खत्म हो जाएगी, और इससे भविष्य में बाजार ही सरकारी नियंत्रण का मोहताज बन जाएगा। आढ़ती प्रतिनिधियों ने सरकार से मांग रखी है कि कमीशन बढ़ाया जाए, मंडियों को प्रोत्साहन मिले,खरीद का अधिकार  आढ़तियों को दिया जाए।