जंगलों से चिंताजनक रिपोर्ट: पाँच वर्षों में उत्तराखंड में 86 बाघ और 749 तेंदुओं की मौत, कई मामलों में कारण अब भी “अज्ञात”
देहरादून | विशेष रिपोर्ट: उत्तराखंड के जंगलों से सामने आई एक चिंताजनक तस्वीर ने वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देहरादून | विशेष रिपोर्ट: उत्तराखंड के जंगलों से सामने आई एक चिंताजनक तस्वीर ने वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित और सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच राज्य में 86 बाघों और 749 तेंदुओं की मौत दर्ज की गई है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि बड़ी संख्या में मामलों में मौत का कारण “अज्ञात” बताया गया है, जिससे निगरानी और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
RTI के जवाब में उत्तराखंड वन विभाग द्वारा साझा किए गए आँकड़े बताते हैं कि बीते पाँच वर्षों में बाघों की मौतें अलग-अलग कारणों से हुईं—जिनमें आपसी संघर्ष, प्राकृतिक कारण, सड़क दुर्घटनाएँ और शिकार के मामले शामिल हैं। इसके बावजूद कई मौतों के पीछे स्पष्ट कारण दर्ज नहीं हो सके। यही स्थिति तेंदुओं के साथ और भी गंभीर दिखती है, जहाँ सैकड़ों मामलों में मृत्यु के कारणों पर स्पष्टता नहीं है।
बाघों की मौत का साल-दर-साल आंकड़ा देखें तो कुछ वर्षों में असामान्य उछाल दिखाई देता है। रिपोर्ट के मुताबिक 2023 और 2025 जैसे वर्षों में मौतों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रही। वहीं तेंदुओं के मामले में हर साल औसतन सौ से अधिक मौतें दर्ज होना यह संकेत देता है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष, दुर्घटनाएँ और प्रबंधन की चुनौतियाँ लगातार बढ़ रही हैं।
वन विभाग का तर्क है कि राज्य में बाघों और तेंदुओं की कुल आबादी में वृद्धि हुई है, इसलिए मौतों का पूर्ण आँकड़ा अपने-आप में गिरावट का संकेत नहीं माना जा सकता। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि “अज्ञात कारण” की ऊँची हिस्सेदारी बताती है कि पोस्ट-मार्टम, फील्ड मॉनिटरिंग और डेटा रिकॉर्डिंग में खामियाँ हैं। यही खामियाँ संरक्षण की पूरी श्रृंखला को कमजोर बनाती हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड जैसे पर्वतीय और तराई क्षेत्रों वाले राज्य में सड़कें, रेलवे लाइनें, बढ़ता शहरीकरण और जंगलों में मानवीय दखल मौतों के प्रमुख कारक बन रहे हैं। तेंदुओं की अधिक मौतें इस बात का भी संकेत हैं कि वे मानव बस्तियों के ज्यादा करीब आ रहे हैं—जिससे टकराव, जहरखुरानी और दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है।
पर्यावरणविदों का साफ कहना है कि केवल संख्या बढ़ने के दावे काफी नहीं हैं। हर मौत की वैज्ञानिक जांच, पारदर्शी रिपोर्टिंग और समयबद्ध सार्वजनिक खुलासा जरूरी है। साथ ही संवेदनशील कॉरिडोरों पर स्पीड-कंट्रोल, अंडरपास/ओवरपास, कैमरा-ट्रैप की संख्या बढ़ाना और स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ना अब टालने योग्य नहीं रहा।
कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट चेतावनी है कि अगर निगरानी और जवाबदेही नहीं बढ़ी, तो संरक्षण की सफलता के दावे खोखले साबित हो सकते हैं। जंगलों की सेहत केवल आबादी के आँकड़ों से नहीं, बल्कि हर जान की सुरक्षा से मापी जानी चाहिए।


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