दिल्ली: साँसें उधार ली हुई, जीवन गिरवी रखा हुआ
दिल्ली आज सिर्फ राजधानी नहीं, एक ऐसी विशाल मशीन बन गई है जो हर सेकंड लाखों साँसें निगलती और वापस ज़हर उगलती है। हर सर्दी की सुबह धुंध नहीं उतरती
दिल्ली आज सिर्फ राजधानी नहीं, एक ऐसी विशाल मशीन बन गई है जो हर सेकंड लाखों साँसें निगलती और वापस ज़हर उगलती है। हर सर्दी की सुबह धुंध नहीं उतरती — मौत का महीन धुआँ उतरता है। आँखें चुभती हैं, गला जलता है, सिर भारी होता है और बच्चे का फेफड़ा पहली कक्षा में पहुँचने से पहले बूढ़ा हो जाता है। सवाल अब यह नहीं कि प्रदूषण कितना बढ़ा, सवाल यह है कि हमारी सोच कितनी घट चुकी है।
राजधानी का Air Quality Index “Very Poor” से “Severe” तक फिसलता-चढ़ता रहता है। कभी 380, कभी 460, कभी 500। अस्पतालों के सरकारी आँकड़े बताते हैं कि पिछले तीन साल में दिल्ली के छह अस्पतालों में दो लाख से ज़्यादा लोग फेफड़ों से जुड़ी बीमारी लेकर पहुँचे। खतरनाक बात यह है कि यह नया “नॉर्मल” बन गया है। लोग अब दम घुटने पर भी नार्मल बातचीत करते हैं — जैसे मौत की गंध भी दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी हो। लेकिन असली मुद्दे पर हमें कोई चैनल, कोई नेता, कोई विज्ञापन बात नहीं करता — और वह मुद्दा है जीवन-दृष्टि। आचार्य प्रशांत कहते हैं:“प्रदूषण बाहर का नहीं, भीतर का है।” हवा में धुआँ तभी भरता है जब दिमाग में लालच भरा हो। सड़क पर वाहन तभी उतरते हैं जब मन में दौड़ हो। कचरा तभी बढ़ता है जब इच्छाएँ अनियंत्रित हों। बाहरी अव्यवस्था, हमेशा भीतर की अव्यवस्था की औलाद होती है।दिल्ली की समस्या सिर्फ मौसम, पराली या वाहनों की नहीं… यह समस्या अति की है। अति उपभोग, अति तेजी, अति सुविधा, अति दिखावा।हम ऐसे शहर में जी रहे हैं जहाँ “जरूरत” से ज़्यादा “चाहत” चलाती है। हर घर में दो-चार वाहन, हर दुकान पर प्लास्टिक, हर कॉलोनी में कचरे का पहाड़ और हर दफ्तर में एयर प्यूरीफायर। ऐब्सर्ड चीज़ है — जिस हवा को हम खराब करते हैं, उसी हवा को साफ़ करने के लिए मशीन खरीदते हैं। आचार्य प्रशांत कहते हैं “जब मन साफ़ हो जाए, जीवन सरल हो जाए, इच्छाएँ घट जाएँ… प्रकृति खुद ठीक होने लगती है।” यह आध्यात्मिक बयान नहीं, पारिस्थितिकी का सिद्धांत है।सादगी = कम प्रदूषण।जागरूकता = कम धुआँ। संयम = स्वस्थ शहर।हम “बड़प्पन” गलत जगह तलाश रहे हैं।बड़ा घर, बड़ी कार, बड़ा मॉल, बड़ा शोर — ये सब छोटा जीवन बनाते हैं।बड़ा आदमी वह है जो कम में जी सके। कितनी भी सरकारी नीतियाँ बना लो, जब तक मनुष्य के भीतर बदलाव नहीं आता, शहर की हवा कभी साफ़ नहीं होगी। गीता इसलिए ज़रूरी है — क्योंकि वह भीतर का शासन सिखाती है।नियंत्रण, अनुशासन, विवेक — यहीं से बाहरी बदलाव की शुरुआत होती है। दिल्ली के प्रदूषण पर सबसे सही सवाल शायद यह है:“हम अपनी जिंदगी में क्या बदलने को तैयार हैं?” जब यह सवाल सही हो जाता है, तो बाकी सब हल अपने-आप मिल जाते हैं —कम वाहन, साझा परिवहन, कम उपभोग, पेड़ों का सम्मान, और प्रकृति के प्रति श्रद्धा।दिल्ली की हवा आज बीमार है।लेकिन बीमारी हवा की नहीं — हमारी आदतों की है।शहर को बचाने का पहला कदम हवा में नहीं, मन में उठना चाहिए।


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