ये कैसा अभियान? जो काट रहे कॉलोनियां, वही चला रहे "खेत बचाओ अभियान"

आजकल एक नया चलन तेजी से देखने को मिल रहा है। जिन लोगों ने वर्षों तक खेती की जमीनों को काट-काटकर कॉलोनियों में बदलने का काम किया, जो हरे-भरे खेतों पर

ये कैसा अभियान? जो काट रहे कॉलोनियां, वही चला रहे "खेत बचाओ अभियान"

आजकल एक नया चलन तेजी से देखने को मिल रहा है। जिन लोगों ने वर्षों तक खेती की जमीनों को काट-काटकर कॉलोनियों में बदलने का काम किया, जो हरे-भरे खेतों पर कंक्रीट के जंगल खड़े करने में सबसे आगे रहे, वही लोग अब "खेत बचाओ अभियान" के बड़े पैरोकार बनकर सामने आ रहे हैं। यह स्थिति किसी विडंबना से कम नहीं है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कैसा अभियान है और इसकी मंशा क्या है?

किसान की जमीन को भू-माफियाओं, बिल्डरों और कॉलोनाइजरों ने हमेशा एक व्यापारिक अवसर के रूप में देखा है। शहरों के आसपास की उपजाऊ जमीनें तेजी से रिहायशी और व्यावसायिक परियोजनाओं में तब्दील होती चली गईं। जहां कभी गेहूं, धान और सरसों की फसलें लहलहाती थीं, वहां आज बहुमंजिला इमारतें, प्लॉट और पक्की सड़कें दिखाई देती हैं। यह परिवर्तन विकास के नाम पर हुआ, लेकिन इसके परिणामस्वरूप कृषि भूमि लगातार सिकुड़ती चली गई।

विडंबना यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में जिन लोगों की भूमिका सबसे अधिक रही, आज वही लोग मंचों पर खड़े होकर खेती बचाने की बात कर रहे हैं। वे संगोष्ठियां कर रहे हैं, सेमिनार आयोजित कर रहे हैं और किसानों के हितैषी होने का दावा कर रहे हैं। उनके भाषणों में कृषि संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और खाद्य सुरक्षा की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। लेकिन जनता यह भी जानती है कि उनके हाथों से कितने खेत कॉलोनियों में तब्दील हुए हैं।

यह स्थिति वैसी ही है जैसे कोई व्यक्ति नदी को प्रदूषित करे और फिर नदी संरक्षण का झंडा उठाकर लोगों को उपदेश देने लगे। यदि वास्तव में खेत बचाने की चिंता है तो सबसे पहले उन गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए जो कृषि भूमि को तेजी से समाप्त कर रही हैं। केवल भाषण देने, पोस्टर लगाने और अभियान चलाने से खेत नहीं बचेंगे।

खेत केवल मिट्टी का एक टुकड़ा नहीं होते। वे देश की खाद्य सुरक्षा का आधार हैं। किसान की आजीविका, पर्यावरण का संतुलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी खेतों पर ही टिकी हुई है। जब खेत कम होंगे तो उत्पादन कम होगा, खाद्यान्न संकट बढ़ेगा और आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। इसके बावजूद यदि उपजाऊ जमीनों को अंधाधुंध तरीके से कॉलोनियों में बदला जाता रहा तो "खेत बचाओ" के नारे केवल दिखावा बनकर रह जाएंगे।

दरअसल, समस्या केवल दोहरे चरित्र की नहीं है, बल्कि सोच की भी है। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास और विनाश के बीच की रेखा को समझना भी उतना ही जरूरी है। शहरों का विस्तार होना चाहिए, लोगों को आवास मिलना चाहिए, लेकिन इसके लिए कृषि भूमि को खत्म करना कोई स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए समुचित भूमि उपयोग नीति, सख्त नियम और ईमानदार क्रियान्वयन की जरूरत है।

समाज को भी ऐसे अभियानों के पीछे की वास्तविकता को समझना होगा। यदि कोई व्यक्ति या संस्था वास्तव में खेत बचाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले अपने आचरण से इसकी शुरुआत करनी होगी। जिन्होंने स्वयं खेतों को कॉलोनियों में बदलने का काम किया है, उन्हें पहले आत्ममंथन करना चाहिए। केवल सार्वजनिक मंचों पर किसानों के हितैषी होने का दावा करने से विश्वास नहीं बनता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि खेत बचाने का अभियान नारों और फोटो सेशन तक सीमित न रहे। इसके लिए ठोस नीतियां बनें, कृषि भूमि की सुरक्षा के लिए कानूनों का सख्ती से पालन हो और अवैध कॉलोनियों पर प्रभावी कार्रवाई की जाए। साथ ही, उन लोगों से भी सवाल पूछे जाएं जो एक ओर खेतों को खत्म करने में लगे हैं और दूसरी ओर खुद को खेती का सबसे बड़ा संरक्षक बताने का प्रयास कर रहे हैं।

अंततः यही कहना उचित होगा कि खेत बचाने का अभियान तभी सार्थक होगा जब उसमें ईमानदारी, पारदर्शिता और आत्मचिंतन शामिल होगा। अन्यथा जनता यह सवाल पूछती रहेगी – "ये कैसा अभियान, जो काट रहे कॉलोनियां, वही चला रहे खेत बचाओ अभियान?"।                            प्रदीप फुटेला, वरिष्ठ पत्रकार,संपादक कुमाऊँ केसरी