ऋषिकेश में आत्मज्ञान का उत्सव

ऋषिकेश। गंगा तट पर स्थित स्वतंत्रानंद आश्रम में आयोजित दो-दिवसीय शिविर में आध्यात्मिक विषय के साथ साथ आत्मज्ञान , भीतर के झूठ, अज्ञान ,डर,भ्रम झूठी

ऋषिकेश में आत्मज्ञान का उत्सव

जहां प्रेम नहीं है, वहां भीतर एक खालीपन और तनाव होता है: आचार्य प्रशांत 

ऋषिकेश। गंगा तट पर स्थित स्वतंत्रानंद आश्रम में आयोजित दो-दिवसीय शिविर में आध्यात्मिक विषय के साथ साथ आत्मज्ञान , भीतर के झूठ, अज्ञान ,डर,भ्रम झूठी मान्यताओं पर कड़वी सच्चाई से रूबरू करवाया। देश के विभिन्न राज्यों से हजारों लोग इस शिविर में पहुंचे, जबकि लाखों प्रतिभागियों ने ऑनलाइन माध्यम से इसे सुना।
   आचार्य प्रशांत ने अपने सत्रों में कठोपनिषद और ऋभु गीता के माध्यम से आत्मज्ञान, स्वतंत्रता और जीवन के झूठे ढांचों पर सीधा प्रहार किया। उनका कहा कि“अपने आप से मीठे झूठ बोलना ही सबसे बड़ा खतरा है।” उनका कहना था कि व्यक्ति खुद को जितना धोखा देता है, उतना ही उसका असर समाज और प्रकृति पर दिखता है। उन्होंने प्रेम और हिंसा के संबंध को जोड़ते हुए कहा—“जहां प्रेम नहीं है, वहां भीतर एक खालीपन और तनाव है, और वही तनाव बाहर हिंसा के रूप में निकलता है।” जलवायु संकट को लेकर उन्होंने सीधा तर्क दिया कि यह सिर्फ तकनीकी या नीतिगत समस्या नहीं, बल्कि मनुष्य की मानसिक स्थिति का प्रतिबिंब है। “जितना भीतर अशांत मन होगा, उतनी ही बाहर की दुनिया भी जलती दिखाई देगी,” । उन्होंने कहा कि भीतरी खोखलेपन के कारण ही भोगवादी प्रवृत्ति जन्म लेती है और हम अपने भीतर झांकने की बजाय बाहर की दुनिया को ही सत्य मानने लगते हैं।
   आधुनिक जीवन की सबसे चर्चित अवधारणा—“पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ का बैलेंस”—पर भी उन्होंने सवाल खड़ा किया। उनका कहना था कि यह विभाजन ही झूठा है। “जीने वाला एक ही व्यक्ति है, फिर यह दो अलग-अलग जीवन कहां से आ गए? यह सिर्फ अपने भ्रम को बनाए रखने का तरीका है,” । उन्होंने युवाओं को कैरियर, आपसी रिश्तों, नशे की बढ़ती आदत, जलवायु परिवर्तन जैसे ज्वलंत विषयों को लेकर आगाह किया तथा कहा कि चुनौतियां तो आएंगी उससे जूझ जाओ यही सफलता का रास्ता बनेंगी। उन्होंने महिलाओं से धर्म के नाम पर झूठे आडम्बरों से सचेत रहने को कहा क्योंकि तथाकथित बाबा चमत्कार के नाम पर महिलाओं को अपने चंगुल में फंसाते है, जबकि चमत्कार जैसा कुछ होता नहीं है। आचार्य प्रशांत ने महिलाओं से किसी पर आश्रित होने की बजाय खुद कमाने की सलाह दी।
     गंगा किनारे आयोजित गतिविधियों में प्रतिभागियों ने कबीर साहब के भजनों का सामूहिक गायन किया, जो केवल संगीत नहीं बल्कि आत्मचिंतन का माध्यम बन गया।
शाम को आयोजित पुस्तक हस्ताक्षर सत्र में भी भारी भीड़ देखने को मिली। लोग सिर्फ किताब पर साइन नहीं, बल्कि एक विचार से जुड़ने के लिए कतार में खड़े थे। विदेशों से आए प्रतिभागियों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि यह आंदोलन अब सीमाओं से बाहर जा चुका है।
ऑस्ट्रेलिया से आए एक प्रतिभागी ने बताया कि भाषा की बाधा के बावजूद वे पिछले कई वर्षों से आचार्य प्रशांत के साथ जुड़े हैं—क्योंकि सवाल सार्वभौमिक हैं।
शिविर के बाद 27 अप्रैल को आचार्य प्रशांत का संबोधन एम्स ऋषिकेश में प्रस्तावित है, जहां वे युवाओं और चिकित्सा छात्रों से संवाद करेंगे। उनका फोकस सिर्फ आध्यात्मिक मंचों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा और समाज के हर हिस्से तक पहुंचने का है।