विधायक अरविन्द पांडेय के पुत्र द्वारा बुक्सा जनजाति की महिला की जमीन हड़पने के मामले में जिलाधिकारी ने जांच समिति गठित की
रुद्रपुर/बाजपुर। उधमसिंह नगर जिले के बाजपुर क्षेत्र के ग्राम सैमलपुरी में भूमि विवाद अब सीधा सियासी रंग लेता नजर आ रहा है। शिकायतकर्ता श्रीमती नन्नी देवी और संजू
विधायक अरविन्द पांडेय का विवादों से है पुराना नाता
रुद्रपुर/बाजपुर। उधमसिंह नगर जिले के बाजपुर क्षेत्र के ग्राम सैमलपुरी में भूमि विवाद अब सीधा सियासी रंग लेता नजर आ रहा है। शिकायतकर्ता श्रीमती नन्नी देवी और संजू कुमार ने जिलाधिकारी को दिए प्रार्थना पत्र में गंभीर आरोप लगाए हैं कि अनुसूचित जनजाति (बुक्सा) की जमीन को कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर एक सामान्य वर्ग के व्यक्ति के नाम दर्ज करा दिया गया।
शिकायत के अनुसार खाता संख्या 20 के अंतर्गत खसरा संख्या 25/1 (रकबा 1.154 हेक्टेयर) और खसरा संख्या 26 (रकबा 0.379 हेक्टेयर) की भूमि मूल रूप से अनुसूचित जनजाति श्रेणी में दर्ज थी। आरोप है कि राजस्व वाद (संख्या 22/3 वर्ष 2010-11) के तहत उक्त भूमि का कुछ हिस्सा अतुल कुमार, निवासी गुलजारपुर, के नाम दर्ज करा दिया गया—जो नियमों के विपरीत है, क्योंकि जनजातीय भूमि का हस्तांतरण सामान्य वर्ग को कानूनी रूप से प्रतिबंधित माना जाता है।
मामले को और संवेदनशील बनाता है यह आरोप कि अतुल कुमार के पिता क्षेत्रीय विधायक अरविन्द कुमार हैं, जिन पर प्रभाव का इस्तेमाल करने के आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि न्यायालय से निर्णय उनके पक्ष में आने के बावजूद उन्हें जमीन पर कब्जा नहीं लेने दिया जा रहा और लगातार दबाव व धमकी का सामना करना पड़ रहा है।
यह मामला केवल जमीन विवाद तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सत्ता बनाम अधिकार की लड़ाई के रूप में उभरता दिख रहा है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि क्या जनजातीय भूमि की सुरक्षा के कानून सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं, या फिर प्रभावशाली लोगों के सामने सिस्टम झुक रहा है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया ने जांच के आदेश दे दिए हैं। उन्होंने अपर जिलाधिकारी कौस्तुभ मिश्रा की अध्यक्षता में चार सदस्यीय जांच समिति गठित की है, जिसमें उपजिलाधिकारी बाजपुर, बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी और जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी शामिल हैं। समिति को 15 दिनों के भीतर विस्तृत जांच कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रशासन का यह कदम फिलहाल संतुलित नजर आता है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जांच निष्पक्ष होगी या फिर सियासी दबाव में मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा। क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में जमीन विवाद और सत्ता का गठजोड़ कोई नई बात नहीं है।
अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जांच रिपोर्ट क्या सच सामने लाती है—क्या यह मामला नियमों के उल्लंघन का है या फिर प्रभावशाली हस्तक्षेप का? और सबसे अहम, क्या पीड़ितों को उनका हक मिल पाएगा या यह मामला भी सिस्टम की फाइलों में दबकर रह जाएगा।


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