खाड़ी संकट का असर ‘बेडरूम’ तक: क्या भारत में महंगे हो जाएंगे कंडोम?

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव—खासकर अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच टकराव—का असर अब सिर्फ पेट्रोल-डीजल या एलपीजी तक

खाड़ी संकट का असर ‘बेडरूम’ तक: क्या भारत में महंगे हो जाएंगे कंडोम?

अमेरिका-ईरान तनाव से सप्लाई चेन प्रभावित, कच्चे माल की कमी और लागत बढ़ने से 7,000 करोड़ के उद्योग पर संकट

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव—खासकर अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच टकराव—का असर अब सिर्फ पेट्रोल-डीजल या एलपीजी तक सीमित नहीं रहा। इसका प्रभाव अब सीधे भारत के कंडोम उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे माल की कमी, सप्लाई चेन में बाधाएं और बढ़ती लागत ने इस सेक्टर को दबाव में ला दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में कंडोम महंगे हो जाएंगे?

भारत का कंडोम बाजार तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र है। साल 2023 में इसका आकार लगभग 861 मिलियन डॉलर यानी करीब 7,000 करोड़ रुपये आंका गया था। अनुमान है कि यह बाजार 2030 तक 11 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के साथ 1.8 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। लेकिन मौजूदा हालात इस विकास पर ब्रेक लगा सकते हैं।

क्यों गहराया संकट?

दरअसल, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने वैश्विक सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। समुद्री परिवहन से लेकर लॉजिस्टिक्स तक, हर स्तर पर रुकावटें देखने को मिल रही हैं। इसके अलावा, पेट्रोकेमिकल उत्पादों की उपलब्धता भी प्रभावित हुई है। सरकारें अब ऊर्जा और आवश्यक उद्योगों को प्राथमिकता दे रही हैं, जिससे कंडोम जैसे उत्पादों के लिए कच्चे माल का आवंटन घट सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेट्रोकेमिकल सप्लाई में 30 से 35 फीसदी तक की कटौती संभव है।

किन चीजों की कमी से बढ़ी परेशानी?

कंडोम निर्माण में मुख्य रूप से लेटेक्स, सिलिकॉन ऑयल और अमोनिया जैसे पदार्थों का उपयोग होता है। सिलिकॉन ऑयल लुब्रिकेशन के लिए जरूरी है, जबकि अमोनिया लेटेक्स को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाता है। फिलहाल सिलिकॉन ऑयल की भारी कमी की खबर है, वहीं अमोनिया की कीमतों में 40 से 50 फीसदी तक उछाल की आशंका जताई जा रही है। इसके साथ ही पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला पीवीसी और एल्युमीनियम फॉयल भी महंगे हो गए हैं।

कौन-कौन सी कंपनियां प्रभावित?

इस संकट का सीधा असर भारत की प्रमुख कंडोम निर्माता कंपनियों पर पड़ रहा है। इनमें HLL Lifecare Limited शामिल है, जो हर साल करीब 221 करोड़ कंडोम का उत्पादन करती है। इसके अलावा Mankind Pharma और Cupid Limited जैसी कंपनियां भी लागत बढ़ने और कच्चे माल की कमी से जूझ रही हैं। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोकेमिकल आधारित लगभग हर उत्पाद इस समय दबाव में है।

क्या बढ़ेंगे दाम?

फिलहाल स्थिति ‘वेट एंड वॉच’ वाली है, लेकिन संकेत साफ हैं—अगर लागत इसी तरह बढ़ती रही तो कंपनियों के पास कीमतें बढ़ाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं होगा। भारत में कंडोम बाजार ‘लो कॉस्ट, हाई वॉल्यूम’ मॉडल पर चलता है, ताकि आम आदमी तक इसकी पहुंच बनी रहे। लेकिन जब उत्पादन लागत बढ़ेगी, तो मुनाफा घटेगा और अंततः इसका असर कीमतों पर पड़ना तय है।

समाज पर क्या होगा असर?

यह मामला सिर्फ एक इंडस्ट्री का नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक पहलू भी बेहद महत्वपूर्ण है। कंडोम परिवार नियोजन, यौन स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण का अहम साधन है। अगर कीमतें बढ़ती हैं और इसके इस्तेमाल में कमी आती है, तो इसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं—जैसे अनियोजित गर्भधारण और यौन संचारित रोगों में वृद्धि।

आगे क्या?

भारत का कंडोम उद्योग इस समय एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ वैश्विक संकट है, दूसरी तरफ घरेलू मांग। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां इस लागत दबाव को कैसे मैनेज करती हैं—क्या वे कीमतें बढ़ाती हैं, या किसी वैकल्पिक सप्लाई का रास्ता निकालती हैं।
एक बात साफ है—दुनिया के किसी भी कोने में उठी हलचल अब सीधे आम आदमी की जिंदगी तक पहुंच रही है, और इस बार इसका असर बेहद निजी दायरे तक आ गया है।