नारी

कमजोर नहीं है कोई नारी, 

नारी

कमजोर नहीं है कोई नारी, 
सब में छिपी एक प्रतिभा है
समय निकाल और भीतर झांक, तुझ में भी एक जज्बा है
जो काम कभी न किया तूने, 
पहल कभी तो करनी होगी, विश्वास जगा खुद के अंदर, कदमों में तेरे दुनिया होगी, 
नहीं है तू किसी के आश्रित, 
 तू तो स्वयं खेवैया है, पहचान जरा अपनी शक्ति, 
तू तो खुद में एक गरिमा है, 
नहीं है भार, 
बस पति के कंधों पर,
 तू भी तो कदम से कदम मिला रही, 
 कदम से कदम क्या मिला रही, कदम आगे उससे पसार रही, 
घर बाहर बच्चे सब कुछ तुझ पर, 
फिर भी हिम्मत ना हार रही, 
सब कुछ मैनेज करती है तू, व्यक्तित्व तेरा बड़ा अनोखा है, कमजोर नहीं है कोई नारी, 
सब में छिपी एक प्रतिभा है, 
बीत गए हैं अब वो जमाने
 जब नारी अबला कहीं जाती थी, 
चूल्हे पर रोटी बनाती थी, 
और घूंघट में रखी जाती थी, 
कुछ भी गलत हो जाए तो बस, 
दोष इसी पर लगता था, 
चाहे कितनी भी गलती हो पर, ताज पुरुष पर ही सजता था, छोड़ आई है अब वो ये सब कुछ पीछे, 
आगे उसको अब बढ़ाना है, कमजोर नहीं है कोई नारी, 
सब में छिपी एक प्रतिभा है, 
     चलते-चलते
 कौन कहता है यह भारत देश, 
पुरुष प्रधान है, 
घर बाहर दोनों मैनेज कर ले, ऐसा कौन महान है, 
नारी में ही इतना बल है, 
दोनों को एकजुट संभाल रही, कर्ताधर्ता वही है सृष्टि की, 
पर पुरुष के हाथ कमान रही, 
दोनों कुल की लाज निभाए, 
ऐसी उसकी काया है, 
कमजोर नहीं है कोई नारी, 
सब में छिपी एक प्रतिभा है।

प्रियंका अग्रवाल 
काशीपुर