हार नहीं मानूॅंगा' बाल कहानी संग्रह
वयस्कों के लिए पुस्तकों की बात हम खूब करते हैं। आज एक बाल कहानी संग्रह पर बात। आजकल बच्चों के लिए खूब लिखा जा रहा है। कई चर्चित नाम है जो बच्चों के लिए
वयस्कों के लिए पुस्तकों की बात हम खूब करते हैं। आज एक बाल कहानी संग्रह पर बात। आजकल बच्चों के लिए खूब लिखा जा रहा है। कई चर्चित नाम है जो बच्चों के लिए हर तरह का साहित्य लिख रहे हैं। 'हार नहीं मानूंगा' बाल कहानी संग्रह संजीव जायसवाल 'संजय' जी की क़लम से निकाल कर आया है। संग्रह अद्विक पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड प्रकाशित हुआ है।
इनके बारे में कुछ कहूॅं, इससे पहले दो शब्द लेखक के बारे में। संजीव जी एक जाने माने साहित्यकार हैं जिनसे सभी साहित्य प्रेमी परिचित हैं। मेरी निगाहों में वे एक बेहद संजीदा लेखक हैं जो हर विषय पर अपनी लेखनी चलाते हैं। यह विविधता उनके भीतर छुपे एक अधीर और जिज्ञासु पाठक के दर्शन कराती है। धीर गंभीर व्यक्तित्व के पीछे एक मुस्कुराता चेहरा, नए-नए विचारों से भरा मस्तिष्क और मददगार दिल। स्वभाव की विनम्रता उन्हें ऊंचाइयों तक ले जाती है। मैंने उन्हें विरोध और प्रतिकार करते हुए भी देखा है मगर एक गरिमा के साथ। अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के कई अनछुए पहलुओं को भी उन्होंने उठाया है मगर इतनी ख़ूबसूरती से कि कमाल हो जाता है। सबसे बड़ी बात, समय का सदुपयोग करना कोई संजय जी से सीखे। समय की पाबंदी और साहित्य के प्रति उनका समर्पण ही हमें समय-समय पर ये सुंदर, रोचक और ज्ञानवर्धन पुस्तकें प्रदान करता है।
और अब संग्रह पर आते हैं। इस संग्रह में पाॅंच रोचक कहानियाॅं हैं।
'ज़िंदगी एक बार ही मिलती है' आर्यन और चंदन की कहानी।
आर्यन पैसे वाले पिता का बेटा और चंदन की आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर। कभी-कभी कमज़ोरी या अभाव भी हमारा शिक्षक बनकर हमें राह दिखाता है और जीवन का लक्ष्य निर्धारित हो जाता है। समाज में दोनों ही तरह के व्यक्तित्व हम देखते हैं। इस कहानी में जहाॅं आर्यन ने लैपटॉप का उपयोग नई-नई फिल्में देखने के लिए किया, वहीं चंदन ने ज्ञान अर्जित करने के लिए। इसी के बल पर एक ऑनलाइन परीक्षा पास कर अमेरिका के किसी कॉलेज में मुक्त शिक्षा का अधिकार पाया। लेकिन चंदन किसी अहं का शिकार नहीं हुआ। इसका श्रेय आर्यन को देते हुए उसका भी हृदय परिवर्तन कर दोस्ती की मिसाल दी उसने।
दूसरी कहानी है 'प्यार का चाबुक' जिसमें जानवरों पर होने वाले अत्याचार को दिखाया है। आदमी जानवरों को घर में पालकर, सामान ढोने ने के लिए इस्तेमाल कर और भी कई प्रकार से इस्तेमाल करता है। इसके अलावा जानवर सर्कस में इस्तेमाल किए जाते हैं जहाॅं पर उनके साथ कई बार बहुत बुरा व्यवहार होता है। उन्हें पेट भर खाना नहीं मिलता और आदेश न मानने पर उन पर चाबुक चलते हैं। इसी वजह से कई बार हाथी और दूसरे जानवरों के बितकने की बात हम अक्सर देखते सुनते हैं। कहानी में जब शिकारी जंगल में प्रवेश करते हैं तो जंगली जानवर मिलकर उन्हें सबक सिखाने की सोचते हैं लेकिन जानवर कहलाने वाले ये प्राणी इंसानों से ज्यादा समझदार निकलते है। ये इंसानों को सबक तो सिखाते हैं मगर अहिंसा का रास्ता अपनाकर। जो आज की दुनिया में एक बहुत बड़ी सीख है खासकर इंसानों के लिए।
अगली कहानी है 'झुम्मन चाचा'। एक मस्त मौला और फक्कड़ इंसान। बीवी बच्चों और परिवार का कोई बंधन नहीं। नितान्त अकेले। लेकिन मोहल्ले भर के बच्चे ही उनका परिवार थे जिन्हें वह किस्से कहानियों के अलावा यथार्थ पर आधारित वैज्ञानिक और तथ्य पूर्ण कहानी भी सुनाया करते। पूरे शहर में एक चोर ने आतंक मचाया था। वह रात को चोरी करता लेकिन किसी के भी पकड़ में नहीं आ रहा था। थक-हारकर सरकार ने भी उसे पकड़ने के लिए बड़ा सा इनाम रख दिया था। इधर चोर के डर से बच्चों का भी घर से निकलना दूभर हो गया था। बच्चों के बगैर झुम्मन चाचा बड़े उदास थे। चोर को पकड़ना आप ज़रूरी हो गया था। वह चोर को पकड़ने का ऐसा नायाब तरीका ढूंढते हैं कि सारे शहर के लोग आश्चर्यचकित हो गए और उनकी समस्या का हल भी हो गया।
अगली कहानी 'मूर्ख नगरी'। दुनिया एक तरफ बुद्धिमानी की कहानी से भरी है तो दूसरी तरफ मूर्खतापूर्ण कृत्यों की दास्तान भी कहती है। ज़ाहिर है कि मूर्ख नगरी का राजा भी मूर्ख ही होगा और उसका काम गुड़ गोबर करने के लिए उसके दरबारी भी एक से एक बढ़कर मूर्ख।
एक बार राजकुमार के कान में बहुत दर्द हो गया था। वज़ह पता नहीं चल रही थी। दरबारी ने तरह-तरह के कारण और उपाय बता दिए। दरअसल बच्चे के कान में चींटी चली गई थी। उन्हीं दिनों काशी में एक विद्वान ब्राह्मण रहता था जिसका नाम धर्मदास था। जब धर्मदास ने इस बारे में सुना तो वह राजा के पास पहुंचा। उसे उम्मीद थी कि अगर वह राजा की मुश्किल हल कर देगा तो उसे अच्छा खासा इनाम मिलेगा जिससे उसकी गरीबी आंशिक रूप से दूर हो जाएगी।
धर्मदास ने ऐसा उपाय बताया कि राजकुमार की मुश्किल हल हो गई और धर्मदास की ज़िंदगी भी आसान हो गई।
पाॅंचवी और आख़िरी कहानी है 'हार नहीं मानूंगा' जो कहानी संग्रह का शीर्षक भी है। आज के समय में एक महत्वपूर्ण सीख देने वाली कहानी। अस्पताल हों, सरकारी विभाग हों या मार्केट में बने शॉपिंग कंपलेक्स, हर जगह हमें इस समस्या से दो-चार होना पड़ता है। भले ही तकनीकी क्षेत्र में कितना विकास कर लें, हर हाथ में मोबाइल है लेकिन सभ्यता की सीढ़ियां चढ़ने में अभी हमें सदियों लगेंगी। लगता तो ऐसा ही है।
पान और गुटके की पीक। जी हाॅं, एक बहुत बड़ी समस्या हमारे देश में। और इसी बात से बीते दिनों का एक संदर्भ याद आया कि जब कुछ भारतीय घूमने के लिए नेपाल गए थे तो उन्होंने यात्रा के दौरान वहां के प्राइवेट टैक्सी को गुटके की पीक से रंग दिया था, स्थानीय लोगों का जमवाड़ा लग गया था और उन्होंने इसे साफ करवा कर ही इन पर्यटकों को छोड़ा। शर्म से सिर नीचा करने वाली घटना थी यह।
इधर कहानी में, ऑफिस की सीढ़ियों में लाल निशान देखकर एक छोटे से बच्चे ने अपने अधिकारी पिता को ऐसा सुझाव दिया कि सभी अधीनस्थ कर्मचारी शर्मिंदा थे और अगले दिन से उन्होंने अपने कार्य स्थल को और उसके रास्ते को साफ रखने की प्रतीक्षा ले ली। इन छोटे-छोटे बदलावों से ही बड़ा बदलाव आता है।
यक़ीनन, अपने बच्चों को मोबाइल डेटा देने से बेहतर उनके हाथ में पुस्तक देना है।
लेखन के साथ-साथ चित्रांकन भी संजीव जी का ही है। पेपर क्वालिटी खूब बढ़िया। जिसकी चिकनाई को बचपन में हम हाथ लगाकर महसूस करते थे। विविध मनमोहक चित्र बचपन की गलियों में ले चलते हैं और दादी- नानी, माता-पिता से सुनी कहानियों की रुपहली लड़ियां याद आ जाती हैं। किसी भी पुस्तक के प्रकाशन में लेखक के साथ-साथ प्रकाशक का भी महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इसके लिए अद्विक प्रकाशन भी बधाई का पात्र है जो आज सफलता के सोपान चढ़ रहा है। पुस्तक का मूल्य ₹220 है और इसे अद्विक पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड से प्राप्त किया जा सकता है।
अमृता पांडे


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