रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर ही बीमारियों से मिल सकता है छुटकारा
गदरपुर। एलर्जिक राइनाइटिस (सर्दी-जुकाम) देखने में भले ही एक सामान्य समस्याप्रतीत होती हो, जो प्रायः 3–5 दिनों में स्वयं ठीक हो जाती है, परंतु आज यह विश्वभर में तेजी
इमबो के ऊपर राज्य स्तरीय संगोष्ठी
गदरपुर। एलर्जिक राइनाइटिस (सर्दी-जुकाम) देखने में भले ही एक सामान्य समस्याप्रतीत होती हो, जो प्रायः 3–5 दिनों में स्वयं ठीक हो जाती है, परंतु आज यह विश्वभर में तेजी से फैलने वाली एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है।यूरोप में सोलहवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के बाद तथा अमेरिका एवंअन्य विकसित देशों में उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान “हे फीवर” के रूप मेंइसकी पहचान बढ़ी। वर्तमान समय में विश्व के लगभग प्रत्येक देश में यहरोग पाया जाता है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों कीतुलना में शहरी आबादी में इसका प्रतिशत अधिक देखा गया है तथा ठंडे औरनम क्षेत्रों में इसकी व्यापकता और भी अधिक पाई जाती है।
एलर्जिक राइनाइटिस का मुख्य कारण शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमताअर्थात् प्रतिरक्षा प्रणाली में असंतुलन माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय मानकों केअनुसार इसके निदान के लिए 7 प्रमुख लक्षण — छींक आना, नाक मेंखुजली, तालु में खुजली, नाक से पानी बहना, नाक बंद होना, आँखों मेंलालिमा होना तथा आँखों से पानी आना — में से कम से कम 2 लक्षणों काउपस्थित होना आवश्यक माना गया है।
यह भी देखा गया है कि जो समस्या पहले अपने आप ठीक हो जाती थी, उसके नियंत्रण के लिए अब दवाइयों का सहारा लेना आवश्यक होता जा रहाहै। आधुनिक चिकित्सा पद्धति की औषधियाँ लक्षणों को नियंत्रित तो करदेती हैं, परंतु वे रोग की पुनरावृत्ति को रोकने में पूर्णतः सक्षम नहीं हैं। साथही, लंबे समय तक इनके सेवन से शरीर पर दुष्प्रभाव पड़ने की संभावना भीबनी रहती है।
आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में “प्रतिश्याय” नामक रोग का उल्लेख मिलता है, जिसके लक्षण एलर्जिक राइनाइटिस से मिलते-जुलते हैं। आयुर्वेद में इसकेउपचार के लिए विभिन्न उपाय वर्णित हैं, किंतु निदान एवं चिकित्सा पद्धतियोंमें एकरूपता तथा पर्याप्त वैज्ञानिक आँकड़ों की कमी के कारण सामान्यजनमानस का ध्यान आयुर्वेद की ओर अपेक्षाकृत कम गया है।
इसी परिप्रेक्ष्य में प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य एवं पद्मश्री सम्मानित वैद्य बालेंदुप्रकाश ने वर्ष 1997 में आयुर्वेद की एक प्राचीन औषधीय संरचना कोएलर्जिक राइनाइटिस की रोकथाम एवं उपचार में विशेष रूप से प्रभावीपाया। यद्यपि शास्त्रों में इस योग का उल्लेख मुख्यतः यकृत संबंधी रोगों केलिए मिलता है, परंतु वैद्य जी ने अपने चिकित्सकीय अनुभवों को व्यवस्थितरूप से संकलित करते हुए इस औषधि को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान केअनुसंधान मानकों पर परखना प्रारंभ किया।
इस संबंध में केरल स्थित मौलाना हॉस्पिटल तथा कानपुर के जी.एस.वी.एम.मेडिकल कॉलेज में नियंत्रित चिकित्सीय परीक्षण कराए गए। इन अध्ययनोंसे यह ज्ञात हुआ कि यह आयुर्वेदिक औषधि एलोपैथिक दवाओं की तुलना मेंअधिक प्रभावी सिद्ध हुई, इसके प्रभाव दीर्घकालिक एवं स्थायी पाए गए तथाइससे किसी प्रकार के दुष्प्रभाव भी नहीं देखे गए।
एक अध्ययन, जिसमें 100 रोगियों को शामिल किया गया था, यह भी पायागया कि इस औषधि के सेवन के पश्चात लगभग 90% रोगियों में 5 मिनट सेभी कम समय में लक्षणों में उल्लेखनीय लाभ प्राप्त हुआ, जबकि सामान्यएलोपैथिक दवाओं का प्रभाव प्रारंभ होने में लगभग 1 घंटे का समय लगताहै।
इन उत्साहवर्धक परिणामों के आधार पर इस औषधि के व्यावसायिकनिर्माण हेतु उत्तराखंड शासन के आयुष विभाग से निर्माण लाइसेंस प्राप्तकिया गया। इस औषधि का नाम “इम्बो” रखा गया, जिसका अर्थ है — “इम्यून बूस्टर”, अर्थात् शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाला।
मैसूर स्थित अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित एक अनुसंधान केंद्र में चूहों परकिए गए परीक्षणों में इम्बो की प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने वालीक्षमता का भी अध्ययन किया गया। संबंधित प्रायोगिक एवं चिकित्सीयअध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित किए जा चुके हैं।
वैद्य बालेंदु प्रकाश ने देशभर में कार्यरत चिकित्सकों से व्यक्तिगत रूप सेसंपर्क कर उन्हें इम्बो के चिकित्सीय परिणामों से अवगत कराया।परिणामस्वरूप आज देश के विभिन्न भागों में लगभग 1500 चिकित्सकअपनी चिकित्सा पद्धति में इम्बो का उपयोग कर एलर्जिक राइनाइटिस सेपीड़ित रोगियों को त्वरित, दीर्घकालिक एवं स्थायी लाभ पहुँचा रहे हैं।
इसी क्रम में आगामी 16 मई 2026 को गदरपुर तहसील के रतनपुर स्थित“पड़ाव – स्पेशियलिटी आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट सेंटर” में एक दिवसीय राज्यस्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर उत्तर प्रदेशके 18 आयुर्वेदिक चिकित्सकों को इम्बो के “ब्रांड एम्बेसडर” के रूप मेंसम्मानित किया जाएगा।
संगोष्ठी में भाग लेने एवं अपने अनुभव साझा करने के लिए प्रयागराज से वैद्यगुंजन अग्रवाल, लखनऊ से वैद्य आकाश उपाध्याय एवं डॉ. साक्षी, पीलीभीतसे डॉ. एकता गुप्ता, बरेली से डॉ. रवि प्रताप सिंह, गाजियाबाद से डॉ. अनिलतिवारी, मेरठ से वैद्य अमित चौधरी, खुर्जा से वैद्य अमित उपाध्याय, नोएडा सेडॉ. राघव शर्मा, ग्रेटर नोएडा से डॉ. अशोक तोमर, संभल से डॉ. असीम राही, गाजीपुर से डॉ. पुष्कर राय, बलिया से डॉ. आशुतोष, कन्नौज से प्रिंस राजसिंह, बिलासपुर से वैद्य विजय प्रकाश मिश्रा, अलीगढ़ से डॉ. वी.के. शर्मातथा मोहम्मद शाहिद मलिक ने अपनी सहमति प्रदान की है।
इसके अतिरिक्त एलर्जिक राइनाइटिस के अनुभवी चिकित्सक एवं वरिष्ठसर्जन डॉ. सुशील टंडन (बरेली), वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. सुनील गौतम(रुद्रपुर), वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. जी.सी. सिंघल (दिल्ली) तथा डॉ.चित्रक बंसल (अमरोहा) भी इस अवसर पर इम्बो से संबंधित अपने अनुभवसाझा करेंगे।
उत्तराखंड आयुष विभाग के ड्रग कंट्रोलर डॉ. के.एस. नेपलच्याल, उत्तराखंडआयुर्वेद विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. राजीव कुरेले, ऊधम सिंह नगरके क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ. आलोक शुक्ला तथा वरिष्ठ प्रशासनिकअधिकारी श्री विवेक प्रकाश भी इस संगोष्ठी में उपस्थित रहेंगे।
प्रस्तावित संगोष्ठी की अध्यक्षता पत्रकार संघ के अध्यक्ष श्री प्रदीप फुटेलाकरेंगे, जबकि नैनीताल लोकसभा क्षेत्र के सांसद एवं पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्रीश्री अजय भट्ट मुख्य अतिथि के रूप में अपनी स्वीकृति प्रदान कर चुके हैं।
कार्यक्रम का संचालन वैद्य चंद्र प्रकाश कैंसर रिसर्च फाउंडेशन में कार्यरतवरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी श्रीमती स्नेह सती, कुमारी नेहा नेगी तथा जबलपुरके वरिष्ठ आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य सुमित श्रीवास्तव द्वारा किया जाएगा।
इस संगोष्ठी के आयोजन का मुख्य उद्देश्य आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में किसीविशिष्ट रोग की चिकित्सा के लिए एकरूपता, प्रामाणिकता एवं वैज्ञानिकविश्वसनीयता स्थापित करना तथा आयुर्वेद में अनुसंधान को बढ़ावा देना है।


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