सोमनाथ : आस्था, संकल्प और पुनर्जागरण की अनंत धारा, सोमनाथ के 1000 वर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में निहित भाव और भारतीय सभ्यता की सनातन चेतना का सबसे जीवंत स्वरूप गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के दक्षिणी तट पर
गजेन्द्र सिंह शेखावत
केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, भारत सरकार
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
न हन्यते हन्यमाने शरीरे
(शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।)
— भगवद्गीता 2.20
श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में निहित भाव और भारतीय सभ्यता की सनातन चेतना का सबसे जीवंत स्वरूप गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के दक्षिणी तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर में दिखाई देता है। बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले सोमनाथ ने इतिहास में अनेक आक्रमणों और विनाश को सहा, लेकिन हर बार फिर खड़ा हुआ और उसकी आरती, घंटियों और श्रद्धा की ध्वनि कभी थमी नहीं।
भारतीय इतिहास के हजारों वर्षों में सनातन धर्म ने कई तरह की चुनौतियों का सामना किया। राजनीतिक परिवर्तन, आक्रमण और सत्ता परिवर्तन के दौर में मंदिरों, मठों और ज्ञान केंद्रों को नुकसान पहुंचाया गया, उनकी संरचनाएं बदली गईं और उन्हें संरक्षण देने वाली व्यवस्थाएं भी प्रभावित हुईं। इसके बावजूद भारतीय आध्यात्मिक परंपरा न केवल जीवित रही, बल्कि समय के साथ स्वयं को पुनर्स्थापित भी करती रही। इसकी सबसे बड़ी शक्ति यही रही कि संस्थागत क्षति और राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद इसकी आत्मा कभी समाप्त नहीं हुई।
प्राचीन और मध्यकालीन भारत में मंदिर केवल पूजा के स्थल नहीं थे, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के भी केंद्र थे। राजसत्ता से उनके गहरे संबंध के कारण वे युद्ध और संघर्ष के समय सबसे पहले निशाने पर आए। महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ पर किया गया आक्रमण इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक है। फारसी ग्रंथों में इसे विजय के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि भारतीय परंपरा में इसे पीड़ा, संघर्ष और पुनर्निर्माण की कथा के रूप में याद किया गया। लेकिन ऐतिहासिक सत्य यह है कि सोमनाथ कभी श्रद्धा से विलुप्त नहीं हुआ। चालुक्य शासकों सहित अनेक राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण कराया और यह निरंतर आस्था का केंद्र बना रहा। ऐसी अनेक घटनाएं भारत के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती हैं।
Credit: Somanatha and Other Medieval Temples in Kathiawad. 1931. Archaeological Survey of India, Vol. XLV, Imperial Series. Calcutta: Government of India.
सोमनाथ का इतिहास केवल एक आक्रमण की कहानी नहीं है। प्राचीन काल से ही प्रभास पाटन एक महान तीर्थभूमि रहा है। इसे विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में प्रभास-पट्टन, शिव-पट्टन और प्रभास-तीर्थ जैसे नामों से जाना गया। यहां तीन पवित्र नदियों का संगम होता है और यही वह स्थान माना जाता है जहां भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग के बाद उनका अंतिम संस्कार हुआ। निकट ही वैराग्य क्षेत्र और गोपी तालाब स्थित हैं, जहां से गोपी चंदन प्राप्त होता है। इस संपूर्ण क्षेत्र की यात्रा को भारतीय तीर्थ परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। काठियावाड़ और गुजरात की प्राचीन धरोहरों पर आधारित कई ऐतिहासिक अभिलेखों और पुरातात्विक रिपोर्टों में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है।
सोमनाथ भारत की समावेशी सांस्कृतिक परंपरा का भी प्रतीक है। यह शैव और वैष्णव परंपराओं के अद्भुत संगम का केंद्र है और हमें यह याद दिलाता है कि भारतीय संस्कृति हमेशा से बहुलतावादी और समावेशी रही है।
स्वतंत्र भारत में सोमनाथ के पुनर्जागरण का आधुनिक अध्याय 12 नवंबर 1947, दीपावली के दिन आरंभ हुआ, जब देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस पवित्र स्थल का दौरा किया। विभाजन की पीड़ा के बीच सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। यह केवल एक मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करने का एक ऐतिहासिक प्रयास था। इसके बाद सोमनाथ को एक सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य प्रारंभ हुआ।
11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में प्रातःकाल संपन्न हुई प्राण-प्रतिष्ठा ने पूरे राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति और आत्मविश्वास को नई शक्ति प्रदान की।
आज जब भारत ‘भारत@2047’ की ओर बढ़ रहा है, तब सोमनाथ से जुड़े ये सभ्यतागत मूल्य और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। तकनीकी बदलाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में भारत दुनिया को यह संदेश देता है कि विकास का अर्थ करुणा को त्यागना नहीं है और शक्ति का अर्थ संयम को छोड़ देना नहीं है। सोमनाथ हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व केवल सामर्थ्य से नहीं, बल्कि स्मृति, विवेक और मानवीय मूल्यों के प्रति …


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