बिगड़ती दिनचर्या से बढ़ रही है पैंक्रियाज रोगियों की संख्या : बालेंदु प्रकाश

रुद्रपुर, उत्तराखण्ड। विश्व के अग्रणी विशेषज्ञों द्वारा फैटी पैंक्रियाज़ (Fatty Pancreas) को एक स्वतंत्र रोग के रूप में मान्यता दिया जाना चिकित्सा विज्ञान में एक महत्वपूर्ण

बिगड़ती दिनचर्या से बढ़ रही है पैंक्रियाज रोगियों की संख्या : बालेंदु प्रकाश

रुद्रपुर, उत्तराखण्ड। विश्व के अग्रणी विशेषज्ञों द्वारा फैटी पैंक्रियाज़ (Fatty Pancreas) को एक स्वतंत्र रोग के रूप में मान्यता दिया जाना चिकित्सा विज्ञान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे यह स्पष्ट हुआ है कि अग्न्याशय में वसा का जमाव केवल एक सामान्य परिवर्तन नहीं, बल्कि मधुमेह, पैंक्रियाटाइटिस तथा अग्न्याशय के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हो सकता है।

इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक एवं पैंक्रियाटाइटिस शोधकर्ता पद्मश्री वैद्य बालेन्दु प्रकाश ने कहा कि रोग की पहचान पहला कदम है, किंतु अब सबसे बड़ी आवश्यकता इसके वास्तविक कारणों और रोकथाम के उपायों की खोज है।

उन्होंने बताया कि पिछले लगभग 30 वर्षों में पैंक्रियाटाइटिस के हजारों रोगियों के नैदानिक अध्ययन के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य बार-बार सामने आया है। अधिकांश रोगियों में देर रात तक जागने, सुबह का नाश्ता छोड़ने या देर से करने तथा नाश्ते में पर्याप्त स्वस्थ वसा के अभाव जैसी जीवनशैली संबंधी आदतें सामान्य रूप से पाई गईं।

वैद्य प्रकाश ने कहा कि उनके नैदानिक अवलोकनों के अनुसार, रात्रि उपवास के बाद समय पर संतुलित नाश्ता न करने अथवा नाश्ते में पर्याप्त स्वस्थ वसा न होने से पित्ताशय (Gall Bladder) का सामान्य संकुचन प्रभावित हो सकता है। इसके कारण पित्त का समुचित स्राव नहीं हो पाता, जिससे ग्रहणी (Duodenum) का सामान्य रासायनिक वातावरण एवं pH प्रभावित होने की संभावना रहती है। ऐसी स्थिति में अग्न्याशय को पाचन क्रिया को संतुलित रखने के लिए अधिक कार्य करना पड़ सकता है। यदि यह स्थिति वर्षों तक बनी रहे, तो अग्न्याशय पर पड़ने वाला यह निरंतर जैविक तनाव वसा के असामान्य संचय (Fatty Pancreas) और आगे चलकर पैंक्रियाटाइटिस जैसी स्थितियों के विकास में भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि जिन व्यक्तियों का गॉलब्लैडर शल्यक्रिया द्वारा निकाला जा चुका है, उनमें पित्त का प्रवाह लगातार बना रहता है। इसका अग्न्याशय की कार्यप्रणाली पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है या नहीं, इस विषय पर भी गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।

वैद्य प्रकाश ने स्पष्ट किया कि ये निष्कर्ष उनके दीर्घकालिक नैदानिक अनुभव एवं अवलोकनों पर आधारित वैज्ञानिक परिकल्पनाएँ हैं, जिनका परीक्षण आधुनिक अनुसंधान पद्धतियों द्वारा किया जाना आवश्यक है।

उन्होंने विश्वभर के गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट, एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, शरीर क्रिया वैज्ञानिकों, पोषण विशेषज्ञों तथा आयुर्वेद एवं आधुनिक चिकित्सा के शोधकर्ताओं से संयुक्त बहु-विषयक अनुसंधान का आह्वान करते हुए कहा कि यदि फैटी पैंक्रियाज़ के वास्तविक कारणों की पहचान हो जाती है, तो केवल इस रोग ही नहीं, बल्कि पैंक्रियाटाइटिस, टाइप-2 मधुमेह तथा अग्न्याशय की अन्य गंभीर बीमारियों की रोकथाम के लिए भी नई दिशा प्राप्त हो सकती है।

उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि शोध का केंद्र केवल ‘फैटी पैंक्रियाज़ का उपचार’ नहीं, बल्कि ‘फैटी पैंक्रियाज़ क्यों होता है?’ इस मूल प्रश्न का उत्तर खोजने पर होना चाहिए।