‘लाडो’ बनी ‘हिरकणी’, Koyna Wildlife Sanctuary में शुरू हुआ प्राकृतिक विचरण

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‘लाडो’ बनी ‘हिरकणी’, Koyna Wildlife Sanctuary में शुरू हुआ प्राकृतिक विचरण

सातारा (विजयकुमार हरिश्चंद्रे): भारत की वन्यजीव संरक्षण नीति के तहत एक अहम कदम उठाते हुए मध्यप्रदेश की ‘लाडो’ अब महाराष्ट्र की सह्याद्री की ‘हिरकणी’ बन चुकी है। Pench Tiger Reserve से लाई गई यह बाघिन अब कोयना के घने जंगलों में प्रकृति-मुक्त होकर विचरण कर रही है। 

सह्याद्री व्याघ्र परियोजना में इसे संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। पेंच व्याघ्र परियोजना में PTR-123 के रूप में चिन्हित इस बाघिन को यहां STR-06 क्रमांक दिया गया है। फरवरी माह में इसे कोयना अभयारण्य के कोर वन क्षेत्र में विधिवत छोड़ा गया, जहां अब उसने स्वतंत्र रूप से मूवमेंट शुरू कर दिया है।

जानकारी के अनुसार, 5 दिसंबर की शाम पेंच के नागलवाड़ी वन परिक्षेत्र से बाघिन को सुरक्षित तरीके से पकड़ा गया था। आवश्यक चिकित्सकीय परीक्षण और तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद विशेष वाहन से उसे महाराष्ट्र लाया गया। कोयना पहुंचने पर पशु-चिकित्सकों ने विस्तृत स्वास्थ्य परीक्षण किया। उसे पानी और मांस उपलब्ध कराया गया, जिसे उसने सामान्य रूप से ग्रहण किया। इसके बाद वन विभाग ने उसे सुरक्षित कोर क्षेत्र में मुक्त कर दिया।
कोयना अभयारण्य में पहले से मौजूद नर बाघ STR-03 ‘बाजी’ के साथ अब ‘हिरकणी’ की उपस्थिति से क्षेत्र में जैविक संतुलन मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बाघों की संख्या में वृद्धि और आनुवंशिक विविधता को बढ़ावा मिलेगा।

लगभग 1165 वर्ग किलोमीटर में फैली सह्याद्री व्याघ्र परियोजना सातारा, सांगली और कोल्हापुर जिलों को समाहित करती है। पश्चिम महाराष्ट्र का यह जैवविविधता से भरपूर क्षेत्र विविध वनस्पतियों, तितलियों, पक्षियों और अन्य वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है।

वन अधिकारियों के अनुसार, ‘हिरकणी’ और ‘बाजी’ की मौजूदगी से कोयना-चांदोली परिक्षेत्र की पारिस्थितिकी और अधिक सशक्त होगी। साथ ही भविष्य में वन्यजीव पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। वन अधिकारी तुषार चव्हाण ने इसे सह्याद्री व्याघ्र परियोजना के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया है।