अध्यात्म व्यक्तिगत लाभ बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि सीमित सोच से बाहर निकालने के लिए हैं: आचार्य प्रशांत
इंदौर। प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक विचारक दार्शनिक आचार्य प्रशांत ने कहा है कि अध्यात्म व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं है यह भीतर के केन्द्र को सही दिशा
इंदौर। प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक विचारक दार्शनिक आचार्य प्रशांत ने कहा है कि अध्यात्म व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं है यह भीतर के केन्द्र को सही दिशा देने, सीमित सोच से बाहर निकलने के लिए है।
इंदौर के लता मंगेशकर सभागार में आचार्य प्रशांत के साथ एक विशेष संवाद सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें हज़ारों की संख्या में श्रोता उपस्थित रहे, जबकि एक लाख से अधिक लोग ऑनलाइन माध्यम से भी इस कार्यक्रम से जुड़े।सत्र के दौरान आचार्य प्रशांत ने सीधे संवाद और प्रश्नोत्तर के माध्यम से लोगों के भीतर बैठे डर, स्वार्थ और भ्रम पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनकी शिक्षाएं व्यक्तिगत लाभ या “पर्सनल प्रॉफिट” बढ़ाने के लिए नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति को अपनी सीमित सोच और निजी दौड़ से बाहर निकालने के लिए हैं।
उन्होंने तथाकथित “इनर ट्रांसफॉर्मेशन” की अवधारणा को चुनौती देते हुए कहा कि यदि भीतर का परिवर्तन बाहर समाज में प्रभाव के रूप में प्रकट नहीं होता, तो वह केवल अहंकार को संतुष्ट करने का माध्यम बनकर रह जाता है। युवाओं और कामकाजी वर्ग को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भय वहीं जन्म लेता है जहां स्वार्थ होता है—जैसे ही स्वार्थ समाप्त होता है, व्यक्ति निर्भय हो जाता है।
अहंकार की प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि हमारी पहचान सामाजिक कंडीशनिंग का परिणाम है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति वह नहीं है जो संसार से भाग जाए, बल्कि वह है जो जीवन के संघर्षों के बीच डटकर खड़ा रहे।कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण, मानसिक स्वास्थ्य और युवाओं के करियर से जुड़े द्वंद्वों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी गहन चर्चा हुई, जिसने श्रोताओं को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया।
सत्र के समापन के बाद आयोजित बुक-साइनिंग कार्यक्रम में सैकड़ों लोग आचार्य प्रशांत से मिलने पहुंचे। देर रात तक लगी लंबी कतारें उनके विचारों के प्रभाव को दर्शाती रहीं। इसी दौरान एक भावुक क्षण भी देखने को मिला, जब एक महिला के अनुरोध पर आचार्य जी ने उनके पांच महीने के शिशु का नामकरण ‘आर्जव’ रखा, जिसका अर्थ है सरलता और निष्कपटता। उन्होंने कहा कि आज के जटिल समय में सरल होना ही सबसे बड़ी ताकत है।
यह संवाद सत्र न केवल इंदौर बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए नई चेतना, साहस और विचार की दिशा देने वाला साबित हुआ।


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