ऋषिकेश में गीता की गूंज: गंगा तट पर आचार्य प्रशांत का दो दिवसीय सत्र
ऋषिकेश। गंगा के निर्मल तट और हिमालयी वातावरण के बीच स्थित स्वतंत्रानंद आश्रम एक बार फिर गहन वैचारिक जागरण का केंद्र बना, दो दिवसीय गीता सत्र में हजारों
भगवद्गीता जीवन में संघर्ष करना सिखाती है: आचार्य प्रशांत
आध्यात्मिकता दिखावे से निकलकर सच्चाई की जमीन पर उतरती है, तो वह केवल विचार नहीं बदलती वह जीवन की दिशा बदलने की क्षमता रखती है।
ऋषिकेश। गंगा के निर्मल तट और हिमालयी वातावरण के बीच स्थित स्वतंत्रानंद आश्रम एक बार फिर गहन वैचारिक जागरण का केंद्र बना, दो दिवसीय गीता सत्र में हजारों साधक देश के विभिन्न हिस्सों से यहां पहुंचे, जबकि बड़ी संख्या में लोग ऑनलाइन माध्यम से भी जुड़े। वातावरण में न तो पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों की चकाचौंध थी और न ही किसी प्रकार का आडंबर—यहां केवल प्रश्न, जिज्ञासा और सत्य की तलाश थी।
सत्र की शुरुआत में ही आचार्य प्रशांत ने स्पष्ट कर दिया कि भगवद्गीता को धार्मिक ग्रंथ मानना उसकी गहराई को सीमित करना है। उनके शब्दों में—“गीता तुम्हें सुलाने के लिए नहीं है, गीता तुम्हें जगाने के लिए है। अगर तुम गीता सुनकर भी वैसे ही जी रहे हो जैसे पहले जी रहे थे, तो समझ लो तुमने गीता को सुना ही नहीं।”
उन्होंने गीता के युद्ध को बाहरी युद्ध के बजाय आंतरिक संघर्ष के रूप में समझाते हुए कहा—“कुरुक्षेत्र कहीं बाहर नहीं है, वह तुम्हारे भीतर है। अर्जुन हर वह व्यक्ति है जो भ्रम, मोह और डर में उलझा हुआ है। और कृष्ण वह चेतना है जो तुम्हें साफ देखने की क्षमता देती है।” यह व्याख्या श्रोताओं के लिए केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि गहराई से व्यक्तिगत अनुभव बनती गई।
गंगा किनारे बैठे साधकों से संवाद करते हुए उन्होंने कहा—“तुम यहां शांति खोजने आए हो, लेकिन गीता शांति का वादा नहीं करती। गीता पहले तुम्हारे झूठ को तोड़ेगी, और जब झूठ टूटेगा तो भीतर अशांति उठेगी। उसी अशांति से सच्चा परिवर्तन जन्म लेता है।” उनके इस दृष्टिकोण ने श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया।
आधुनिक जीवनशैली पर कटाक्ष करते हुए आचार्य प्रशांत ने कहा कि आज का मनुष्य सुविधा, सुरक्षा और सामाजिक मान्यता के पीछे इतना भाग रहा है कि उसने अपने भीतर झांकना ही छोड़ दिया है। “तुम्हारा डर तुम्हारे स्वार्थ से जुड़ा है। जितना ज्यादा तुम पकड़कर रखोगे—रिश्ते, पहचान, उपलब्धियां उतना ही डर बढ़ेगा। गीता कहती है, जो पकड़ रखा है वही बंधन है।”
पर्यावरण के विषय को भी उन्होंने गहराई से जोड़ा। गंगा की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा—“तुम गंगा को मां कहते हो, लेकिन उसी में गंदगी डालते हो। यह श्रद्धा नहीं, यह पाखंड है। जब तक भीतर स्पष्टता नहीं आएगी, बाहर की दुनिया में कोई वास्तविक सुधार नहीं हो सकता।”
युवाओं और कामकाजी वर्ग को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा—“करियर जरूरी है, लेकिन अगर तुम्हारी पूरी पहचान ही करियर बन जाए तो तुम स्वतंत्र नहीं, बल्कि एक मशीन बन जाते हो। गीता तुम्हें यह सिखाती है कि काम करो, लेकिन काम के गुलाम मत बनो।”
सत्र के दौरान मानसिक स्वास्थ्य, रिश्तों की जटिलता और जीवन के उद्देश्य जैसे विषयों पर भी खुलकर चर्चा हुई। कई साधकों ने अपने व्यक्तिगत प्रश्न रखे, जिन पर आचार्य प्रशांत ने बिना किसी लाग-लपेट के जवाब दिए। “समस्या दुनिया में कम है, तुम्हारी दृष्टि में ज्यादा है,” ।
गीता सत्र किसी धार्मिक आयोजन से अधिक एक बौद्धिक और आत्मिक मंथन की प्रक्रिया बन गया। यहां न कोई तैयार जवाब दिए गए, न ही कोई सांत्वना—बल्कि हर व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और अपने जीवन की सच्चाई से सामना करने के लिए प्रेरित किया गया।
आचार्य प्रशांत ने कहा—“अगर यहां से कुछ लेकर जाना है, तो नई मान्यताएं मत ले जाना। बस इतना देखना शुरू करो कि तुम जो जी रहे हो, वह सच है या केवल आदत।” जब आध्यात्मिकता दिखावे से निकलकर सच्चाई की जमीन पर उतरती है, तो वह केवल विचार नहीं बदलती वह जीवन की दिशा बदलने की क्षमता रखती है।


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