बिखरे हुए मन के साथ भी सधा हुआ जीवन संभव, मन का वास्तविक विकार अहंकार से उसका संसर्ग है : आचार्य प्रशांत
ग्रेटर नोएडा। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र में दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने मन, अहंकार और आंतरिक स्वास्थ्य के गहरे संबंध पर प्रकाश
ग्रेटर नोएडा। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र में दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने मन, अहंकार और आंतरिक स्वास्थ्य के गहरे संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिखरे हुए मन के साथ भी सधा हुआ और सार्थक जीवन जिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मन में समस्याएँ होना स्वाभाविक है और उनका उपचार भी संभव है, किंतु मन की प्रत्येक स्थिति को अपनी पहचान बना लेना ही दुख का मूल कारण है।
आचार्य प्रशांत ने कहा कि शरीर में व्याधि हो सकती है और उचित उपचार से वह ठीक भी हो सकती है, लेकिन इसके बाद भी व्यक्ति स्वयं को भीतर से स्वस्थ महसूस नहीं करता। इसका कारण यह है कि वास्तविक अस्वस्थता केवल शरीर की नहीं, बल्कि मन और अहंकार से जुड़ी होती है। मन की बदलती हुई स्थितियों का सहारा अहंकार ले लेता है और व्यक्ति हर विचार, भावना तथा मानसिक उतार-चढ़ाव को अपना स्वरूप मान बैठता है।
उन्होंने कहा कि मन का डांवाडोल होना कोई असामान्य बात नहीं है। मन जहाँ जा रहा है, उसे जाने दें और स्वयं अपने सही कर्म तथा जीवन के उद्देश्य पर केंद्रित रहें। यदि मन को जबरन रोकने या उसके पीछे भागने का प्रयास करेंगे तो वह और अधिक अशांत तथा परेशान करेगा।
आचार्य प्रशांत ने कहा कि मन मूलतः प्राकृतिक है। उसकी चंचलता कोई दोष नहीं, बल्कि उसकी सहज प्रकृति है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब अहंकार मन की हर स्थिति से स्वयं को जोड़ लेता है। इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति मन में जमी हुई लोकधार्मिक मान्यताओं, भ्रमों और झूठी धारणाओं को पहचानकर उनसे मुक्त हो। जब मन को केवल एक प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है और उससे अपनी पहचान नहीं जोड़ी जाती, तभी जीवन में सहजता और संतुलन आता है।
उन्होंने गुरु के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि सच्चा गुरु मनुष्य को मन से लड़ना नहीं सिखाता, बल्कि मन को समझने की दृष्टि देता है। गुरु व्यक्ति को उसके भय, लालसा, भ्रम और अहंकार से परिचित कराकर सत्य की ओर अग्रसर करता है। उन्होंने कहा कि अध्यात्म का उद्देश्य संसार से भागना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जागरूकता, विवेक और ईमानदारी के साथ जीना है। गुरु पूर्णिमा केवल श्रद्धा प्रकट करने का अवसर नहीं, बल्कि अपने भीतर झाँकने और सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का पर्व है।
आचार्य प्रशांत प्रतिष्ठित दार्शनिक, लेखक और स्तंभकार हैं। उनका मिशन जन-आधारित आत्म-शिक्षा (Mass Education of the Self) को समर्पित है। IIT दिल्ली और IIM अहमदाबाद के एल्यूमनस और वॉटकिंस की मोस्ट इन्फ़्लुएंशियल ग्लोबल लिविंग थिंकर्स की सूची में शामिल आचार्य प्रशांत को सोशल मीडिया पर 10 करोड़ से अधिक लोग फ़ॉलो करते हैं। उनका शिक्षण ऐप 50 लाख से अधिक बार डाउनलोड हो चुका है। वे 160 से अधिक पुस्तकों के लेखक भी हैं।


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