चुनावों से पहले गहराते राजनीतिक संकट के बीच आखिर क्यों लहूलुहान है रावलाकोट?

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) इन दिनों अपने हालिया इतिहास के सबसे गंभीर राजनीतिक और मानवीय संकटों में से एक का सामना कर रहा है। इस उथल-पुथल

चुनावों से पहले गहराते राजनीतिक संकट के बीच आखिर क्यों लहूलुहान है रावलाकोट?

अश्वनी कुमार
पूर्व ब्यूरो प्रमुख, आज तक टीवी
जम्मू

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) इन दिनों अपने हालिया इतिहास के सबसे गंभीर राजनीतिक और मानवीय संकटों में से एक का सामना कर रहा है। इस उथल-पुथल का केंद्र पूंछ जिले का रावलाकोट क्षेत्र बन चुका है, जो राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक न्याय और लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को लेकर चल रहे व्यापक जन आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गया है।
जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी के सदस्य सरदार उमर नाज़िर कश्मीरी के अनुसार, रावलाकोट अब एक संघर्ष क्षेत्र में तब्दील हो चुका है। सड़कों को बंद कर दिया गया है, सुरक्षा बलों ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं और स्थानीय लोगों का आरोप है कि हिंसा में बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं तथा अनेक घायल हुए हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने रावलाकोट से मुज़फ्फराबाद जाने वाले सभी प्रमुख मार्ग सील कर दिए हैं, जिसके कारण घायलों को अस्पताल तक पहुंचाना भी अत्यंत कठिन हो गया है।
इस्लामाबाद की कार्रवाई के सबसे मुखर आलोचकों में सरदार उमर नाज़िर कश्मीरी शामिल हैं, जो पिछले दो महीनों से पूरे पीओजेके में आंदोलन का नेतृत्व कर रही एक्शन कमेटी के सक्रिय सदस्य हैं।
एक सार्वजनिक अपील में उन्होंने कहा, "हम कागज़ के पुतले या रोबोट नहीं हैं। इंसानों की हत्या की जा रही है। हमारा खून बह रहा है। रावलाकोट में निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक जीत के जश्न मनाए जा रहे हैं। यह कैसी जीत है? रावलाकोट लहूलुहान है। पूरा शहर छलनी हो चुका है। आखिर पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स हमारे लोगों को क्यों मार रहे हैं? उनका कसूर क्या है? रावलाकोट के बाजारों में हमारा खून बह रहा है। आखिर निर्दोष प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश कौन दे रहा है?"

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनता की वैध मांगों पर बातचीत करने के बजाय बल प्रयोग का रास्ता अपना रही है।उनका दावा है कि केवल पिछले 48 घंटों में ही रावलाकोट में 40 से अधिक लोगों की मौत हुई है, जिनमें 34 नागरिक और छह सुरक्षा कर्मी शामिल हैं। वहीं पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 5 जून से अब तक पूरे क्षेत्र में अशांति के दौरान लगभग 80 लोगों—जिनमें नागरिक और सुरक्षा बलों के सदस्य दोनों शामिल हैं—की मौत हो चुकी है।
हालांकि मीडिया पर लगे प्रतिबंधों और आधिकारिक सूचनाओं की सीमित उपलब्धता के कारण इन हताहतों के आंकड़ों का स्वतंत्र सत्यापन संभव नहीं हो पाया है।

भारत के साथ नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे पूंछ डिवीजन में स्थित रावलाकोट पिछले कई सप्ताह से कड़ी सुरक्षा पाबंदियों के बीच है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सड़कें बंद होने से आटा, दवाइयां, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिससे पहले से आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे लोगों की परेशानियां और बढ़ गई हैं।यह आंदोलन प्रारंभ में सब्सिडी वाले गेहूं के आटे और बिजली दरों में कमी की मांग को लेकर शुरू हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे यह इस्लामाबाद के प्रशासनिक ढांचे और शासन व्यवस्था को चुनौती देने वाले व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदल गया।
5 जून 2026 को पीओजेके के तथाकथित प्रधानमंत्री फैसल मुमताज राठौर के नेतृत्व वाली सरकार ने जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी को गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया। इसके बाद संगठन के कई नेताओं को गिरफ्तार किए जाने की खबरें सामने आईं, जबकि कुछ भूमिगत हो गए और अन्य पूंछ डिवीजन के रावलाकोट स्थित डी-चौक पर बने धरना स्थलों से आंदोलन का संचालन कर रहे हैं।जो आंदोलन आर्थिक मांगों से शुरू हुआ था, वह अब एक व्यापक राजनीतिक अभियान का रूप ले चुका है। एक्शन कमेटी ने अब अपनी मांगों का दायरा बढ़ाकर 38 बिंदुओं तक पहुंचा दिया है, जिनमें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सड़क अवसंरचना, रोजगार, सस्ती बिजली तथा संवैधानिक सुधार प्रमुख हैं।
सबसे विवादास्पद मांगों में से एक पीओजेके विधानसभा में जम्मू-कश्मीर से विस्थापित शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करना है। ये सीटें उन लोगों के लिए निर्धारित हैं, जो 1947 और 1965 के बाद पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में जाकर बस गए थे।
एक्शन कमेटी का आरोप है कि इन आरक्षित सीटों का इस्तेमाल दशकों से इस्लामाबाद द्वारा पीओजेके के चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए किया जाता रहा है।
पीओजेके विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, जिनमें 45 प्रत्यक्ष निर्वाचित और आठ आरक्षित सीटें शामिल हैं। आरक्षित सीटों में महिलाओं के लिए सीटें तथा तकनीकी विशेषज्ञों, उलेमा और प्रवासी प्रतिनिधियों के लिए एक-एक सीट निर्धारित है।
45 निर्वाचित सीटों में से 33 पीओजेके के भीतर की विधानसभा सीटें हैं, जबकि 12 सीटें पाकिस्तान के कराची, लाहौर, रावलपिंडी और इस्लामाबाद जैसे शहरों में बसे जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं।इनमें छह सीटें जम्मू क्षेत्र से विस्थापित मुख्यतः डोगरी और पहाड़ी भाषी शरणार्थियों के लिए तथा शेष छह सीटें कश्मीर घाटी से आए कश्मीरी भाषी शरणार्थियों के लिए निर्धारित हैं।
एक्शन कमेटी का आरोप है कि इन्हीं शरणार्थी निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से इस्लामाबाद दशकों से पीओजेके की सरकारों के गठन को प्रभावित करता रहा है। इसलिए उसने इन सीटों को पूरी तरह समाप्त करने की मांग की है।
दूसरी ओर, पीओजेके सरकार का कहना है कि ये शरणार्थी सीटें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हैं और इन्हें केवल संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ही समाप्त किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि कश्मीरी शरणार्थियों की छह सीटों पर कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 30 से 38 हजार के बीच है, जबकि जम्मू शरणार्थियों की छह सीटों पर लगभग चार लाख मतदाता हैं। एक्शन कमेटी का आरोप है कि कश्मीरी शरणार्थी मतदाताओं का अधिकांश हिस्सा पीओजेके में नहीं रहता, बल्कि पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में बस चुका है और सरकार इन्हीं सीटों के माध्यम से पीओजेके में अपनी पसंद की सरकार बनवाती रही है।
विधानसभा चुनाव 27 जुलाई से शुरू हो चुके हैं और तीन चरणों में कराए जा रहे हैं। मीरपुर डिवीजन में मतदान संपन्न हो चुका है। मुज़फ्फराबाद डिवीजन तथा 12 शरणार्थी निर्वाचन क्षेत्रों में 2 अगस्त को मतदान होगा, जबकि सबसे अधिक तनावग्रस्त पूंछ डिवीजन में 10 अगस्त को मतदान निर्धारित है।
प्रतिबंधित एक्शन कमेटी ने अपने समर्थकों से चुनावों के बहिष्कार की अपील की है। उसका कहना है कि उसके नेतृत्व को राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है और वर्तमान चुनावी व्यवस्था विश्वसनीय नहीं है।
रावलाकोट के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अकील भाई का कहना है कि यह आंदोलन अलगाववाद नहीं, बल्कि बुनियादी मानवाधिकारों की लड़ाई है। उनके अनुसार, "हम केवल स्कूल, अस्पताल, सड़कें, विकास और मतदान के अधिकार की मांग कर रहे हैं। लेकिन सरकार इस आंदोलन को पाकिस्तान विरोधी बताकर बदनाम कर रही है। हम सिर्फ सम्मान के साथ जीना चाहते हैं।"
उन्होंने गिलगित-बाल्टिस्तान तथा पूरे जम्मू-कश्मीर के लोगों से आंदोलनकारियों के समर्थन में आवाज उठाने की अपील की।
राजनीतिक माहौल उस समय और अधिक तनावपूर्ण हो गया जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ से जुड़े बयान सामने आए। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने रावलाकोट के प्रदर्शनकारियों को भारत की तरह पाकिस्तान का "दुश्मन" बताया और उनके साथ किसी भी प्रकार की बातचीत की संभावना से इनकार कर दिया।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या रावलाकोट के लोगों को वास्तव में कश्मीरी माना जाना चाहिए। इस बयान की आंदोलनकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तीखी आलोचना की है। उनका कहना है कि ऐसे बयान संवाद और समाधान के बजाय समाज में विभाजन को और गहरा करते हैं।
पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में जारी यह अशांति केवल आर्थिक असंतोष तक सीमित नहीं रह गई है। यह अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों और इस्लामाबाद तथा पीओजेके के बीच संबंधों को लेकर एक व्यापक टकराव का रूप ले चुकी है।
कड़े सुरक्षा प्रबंधों के बीच चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, जबकि एक बड़ा जन आंदोलन चुनाव बहिष्कार का आह्वान कर रहा है। ऐसे में यह संकट पाकिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि सरकार संवाद का रास्ता अपनाती है या केवल सुरक्षा बलों के सहारे हालात नियंत्रित करने का प्रयास जारी रखती है। यही निर्णय न केवल रावलाकोट के तात्कालिक भविष्य, बल्कि पूरे पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर की दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता को भी प्रभावित करेगा।