असाध्य एवं घातक रोग में कारगर है आयुर्वेदिक औषधी "अमर"
गदरपुर। आयुर्वेद के रसशास्त्र में वर्णित गंधक जारण के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए पारा, तांबा तथा गंधक के संयोग को विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ बार-बार
औषधी को सर्व सुलभ बनाने के लिए 11 अप्रैल को होगा भव्य कार्यक्रम
गदरपुर। आयुर्वेद के रसशास्त्र में वर्णित गंधक जारण के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए पारा, तांबा तथा गंधक के संयोग को विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ बार-बार मर्दन प्रक्रिया कर तथा अग्नि पर पकाकर तैयार की जाने वाली औषधि “अमर” को असाध्य एवं घातक रोग जीर्ण अग्नाशय शोथ के रोगियों में स्थायी एवं पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने में प्रभावी पाया गया है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा जीर्ण अग्नाशय शोथ की चिकित्सा में इस औषधि को पेटेंट भी प्रदान किया गया है, जो देश का पहला तथा विश्व का दूसरा पेटेंट है।
“अमर” औषधि का प्रथम निर्माण एवं चिकित्सकीय प्रयोग मेरठ निवासी स्वर्गीय वैद्य चंद्र प्रकाश द्वारा सत्तर के दशक में किया गया था। उस समय से ही पैनक्रिएटाइटिस के रोगियों में इसके विशेष लाभ के परिणाम प्राप्त हुए। वर्ष 1997 से पद्मश्री से सम्मानित वैद्य बालेंदु प्रकाश के नेतृत्व में विभिन्न प्रकार के पैनक्रिएटाइटिस रोगियों की चिकित्सा सफलतापूर्वक की जा रही है। पिछले 29 वर्षों में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर स्थित विशिष्ट आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्रों में लगभग 2565 रोगियों का उपचार किया जा चुका है।
“अमर” औषधि का निर्माण लगभग तीन वर्षों की दीर्घ प्रक्रिया में पूर्ण होता है। चूँकि इसका निर्माण पारंपरिक पद्धति से किया जाता है, इसलिए इसके विभिन्न बैचों में पूर्ण समानता बनाए रखना एक चुनौती रहा है। इसी उद्देश्य से “अमर” के मानकीकरण तथा वैज्ञानिक विकास के लिए वैद्य चंद्र प्रकाश कैंसर रिसर्च फाउंडेशनके तत्वावधान में ग्राम सिकरौरा स्थित रसशाला में विज्ञान की विभिन्न विधाओं के वैज्ञानिक सहयोग से इसके एकरूप निर्माण हेतु तकनीक विकसित की जा रही है। इस प्रक्रिया में उपयोग की जाने वाली जड़ी-बूटियों के रस का अम्ल-क्षार मान परीक्षण, मर्दन की गुणवत्ता के मूल्यांकन हेतु कंप्यूटर संचालित चित्र विश्लेषक तथा औषधि के विभिन्न चरणों का आधुनिक एक्स-रे विवर्तन तकनीक द्वारा नियमित विश्लेषण किया जा रहा है।
“अमर” का पाक परंपरागत रूप से मिट्टी की हंडियों में अमरूद की लकड़ियों की अग्नि पर किया जाता है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए रसशाला में आधुनिक तकनीक पर आधारित कंप्यूटरीकृत तापमान अभिलेखक यंत्र स्थापित किया गया है, जिसके विकास में देहरादून स्थित विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विशेष भूमिका निभाई है। आयुर्वेद, विज्ञान और समाज को जोड़ने वाली इस पहल के प्रसार एवं प्रचार के उद्देश्य से शनिवार, 11 अप्रैल को प्रातः 11 बजे ग्राम सिकरौरा स्थित रसशाला में एक उद्घाटन समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस समारोह के मुख्य अतिथि श्री अरुण कुमार, उपजिलाधिकारी, बिलासपुर तथा श्री चित्रक मित्तल, अध्यक्ष, नगर पालिका परिषद, बिलासपुर होंगे। इस अवसर पर देहरादून स्थित विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अमृतांश भनोट तथा रुद्रपुर के सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रसिद्ध चावल व्यापारी श्री अरुण अग्रवाल, प्रबंध निदेशक, के.एल.ए. समूह भी विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। समारोह में जीर्ण अग्नाशय शोथ से पीड़ित अनेक रोगी एवं उनके परिवारजन, औषधि निर्माण और अनुसंधान से जुड़े कार्यकर्ता एवं अधिकारी तथा समाज के प्रबुद्ध वर्ग के लोग भी उपस्थित रहेंगे।


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