सूखी पड़ी कृष्णा-कोयना संगम भूमि में मिली अद्भुत ढोकरा शैली की गणेश प्रतिमा
राज्य में वर्षा की कमी के कारण अनेक नदियों का जलस्तर तेजी से घट रहा है।
पुणे / बामणोली (विजयकुमार हरिश्चंद्रे): राज्य में वर्षा की कमी के कारण अनेक नदियों का जलस्तर तेजी से घट रहा है। महाराष्ट्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली कृष्णा और कोयना नदियों के कुछ हिस्सों में नदी का तल पूरी तरह उजागर हो गया है। सातारा जिले के बामणोली–तापोला क्षेत्र में सूखे और दरारों से भरे नदीपात्र में एक अत्यंत आकर्षक एवं दुर्लभ गणेश प्रतिमा मिली है। इसकी कलात्मक शैली ढोकरा धातुकला से मिलती-जुलती प्रतीत होने के कारण स्थानीय लोगों तथा कला प्रेमियों के बीच उत्सुकता का विषय बन गई है।
ढोकरा कला भारत की सबसे प्राचीन धातु-ढलाई परंपराओं में से एक मानी जाती है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के आदिवासी समुदायों ने इस कला को सदियों से संरक्षित रखा है। सह्याद्रि पर्वतमाला के कृष्णा-कोयना क्षेत्र में इस प्रकार की प्रतिमा का मिलना इतिहासकारों और कला विशेषज्ञों के लिए आश्चर्य का विषय माना जा रहा है।
भगवान गणेश को मंगल, शुभारंभ, बुद्धि और सिद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में गणेश के अनेक कलात्मक और क्षेत्रीय स्वरूप देखने को मिलते हैं। पुरंदर तालुका स्थित Bhuleshwar Temple में विराजमान शक्तिविनायकी स्वरूप से लेकर विभिन्न मुद्राओं और सोंडों वाली गणेश प्रतिमाएं भारतीय मूर्तिकला की समृद्ध परंपरा को दर्शाती हैं।
बामणोली क्षेत्र में मिली यह गणेश प्रतिमा ऋषि-मुद्रा जैसी बैठी हुई अवस्था में दिखाई देती है। इसकी बारीक धातुकारी, अलंकारिक संरचना और आदिम कलाशैली विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। जानकारों का मानना है कि प्रतिमा के कालखंड, धातु संरचना और ऐतिहासिक महत्व का निर्धारण पुरातत्व विशेषज्ञों तथा मूर्तिशास्त्र के विद्वानों द्वारा विस्तृत अध्ययन के बाद ही संभव होगा।
यह प्रतिमा किस काल की है, क्या इसका संबंध स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं से है अथवा यह दूरस्थ ढोकरा कला परंपरा के प्रभाव को दर्शाती है, इसका स्पष्ट उत्तर शोध के बाद ही मिल सकेगा। फिलहाल इस अद्भुत गणेश प्रतिमा ने कृष्णा-कोयना घाटी के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के प्रति नई जिज्ञासा और चर्चा को जन्म दिया है।


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