उत्तराखंड की नंदा देवी राजजात यात्रा एक कुम्भ है और आस्था का संगम है

नजीबाबाद (महताब ख़ान चांद)  देव भूमि उत्तराखंड जो कि धार्मिक मान्यताओं आस्था विश्वास का एक अनूठा संगम है और यहां देवी देवताओं का वास

उत्तराखंड की नंदा देवी राजजात यात्रा एक कुम्भ है और आस्था का संगम है

नजीबाबाद (महताब ख़ान चांद)  देव भूमि उत्तराखंड जो कि धार्मिक मान्यताओं आस्था विश्वास का एक अनूठा संगम है और यहां देवी देवताओं का वास और मां गंगा का उद्गम है और अनेक नदियों का संगम है जो हमें आस्था और श्रद्धा से सीधे तौर पर जोड़ता है ऐसे में जबकि धार्मिक स्थल हरिद्वार में कुंभ लगने जा रहा है उससे पहले उत्तराखंड राज्य मैं एक और कुम्भ का प्रारम्भ हुआ है जो बारह वर्षों के बाद अवसर आता है और वह है मां नंदा देवी राजजात यात्रा जो बारह साल के लम्बे इंतेज़ार के बाद आती है और जिस प्रकार पूरे विश्व को बारह साल बाद लगने वाले कुंभ की प्रतीक्षा रहती है ठीक उसी प्रकार देव भूमि उत्तराखंड के लोगो को मां नंदा देवी राजजात यात्रा का इंतजार रहता है और इसके लिए बड़ी तैयारी पहले से ही प्रारंभ कर दिया जाता है और बड़ी आस्था श्रद्धा के साथ चमोली के कुरुड स्थिति सिद्धपीठ मां नंदा देवी मन्दिर जो कि भक्ति आस्था और हिमालयी संस्कृति का दिव्य संगम है और उत्तराखंड की सम्रद्ध परम्परा से जुड़ा यह पावन स्थल अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए विशेष पहचान रखता है

और कुरुड से जुड़ी मां नंदा देवी की लोकजात और राजजात यात्रा उत्तराखंड की जीवंत लोकपरम्पराओ और गहरी आस्था का अद्भुत प्रतीक है और यह धार्मिक मान्यताओं की ऐतिहासिक पौराणिक यात्रा नौटी गांव चमोली से पांच सितंबर को पारंपारिक नंदा देवी राजजात यात्रा की डोली भव्य आयोजन और आस्था के साथ रवाना होती है जहां इस अवसर को देखने के लिए बड़ी संख्या मैं श्रद्धालु आते हैं और मां को विदाई देने के लिए आस्था के समुद्र में डूब जाते हैं और नम आंखों गगनभेदी नारों के साथ मां नंदा देवी राजजात यात्रा को विदाई देते हैं और फिर यह यात्रा कुरुड चरबग मधकोर उस्तोली भेटी हुंगी सुना चेपडो नंदकेसरी फलदियागाव मुन्दोली वाण गौरीलीपातल वेदनी बुग्याल पातटन चौनिया रुप कुंड शीला समुद्र मैं पूजा करते हुए सुतोल कनोली कुलिग ल्वाणी उलगा बेराधर गोठिडा होकर छब्बीस दिन में दो सौ अस्सी किलोमीटर की यात्रा पूरी कर मुख्य गंतव्य होमकुन्ड पहुंचती है और यह यात्रा कठिन हिमालयी मार्गो दुर्गम रास्तों से होकर गुजरती है और इस महत्वपूर्ण आस्था विश्वास की यात्रा पूरी कराने मैं चौसिग्याखाड चार सींग वाला भेड़ यात्रा का मार्ग दर्शन करते हुए आगे आगे चलता है और देवराडा तक समापन यात्रा पूरी कराता है जिसे बड़े आदर सम्मान के साथ पाल-पोस कर इस अवसर के लिए तैयार किया जाता है।

वहीं जब यह महत्वपूर्ण यात्रा मां नंदा देवी मन्दिर नौटी कासुबा गांव से जब प्रारम्भ होती है उसका कुशल नेतृत्व चांदपुर गढ़ी के वंशज के राजकुंवर करते हैं और यात्रा के पड़ाव ईडाबधानी नंदा देवी का ननिहाल कासुबा राजकुवारो का मूल गांव और कुलमारी देवी की ससुराल बगुवावासा मां नंदा देवी का निवास स्थान से होकर अंतिम पड़ाव होम कुंड मैं जाकर चौसिगिया खाडू को विदा कर होता है और यात्रा मैं विशेष मेढा चौसिंगा खाडू इसे मां नंदा देवी का प्रतीक माना जाता है जो पूरी यात्रा के आगे आगे चलकर मार्गदर्शन करता है और होम कुंड मैं जाकर अदृश्य हो जाता है इस यात्रा का महत्व इसलिए भी है कि मां नंदा देवी हर बारह साल के बाद अपनी ससुराल से मायके आती है और सुहागिन बेटी की तरह उन्हें विदा किया जाता है और पूरी यात्रा मैं ढोल दमाऊ लोकगीतों जागर और पारम्परिक छतोली के साथ नंगे पांव भक्ति आस्था विश्वास मै सराबोर होकर भक्त यात्रा मैं शामिल होते हैं।

वहीं धार्मिक मान्यता है कि मां नंदा देवी को भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती का रुप माना जाता है और इन्हें गढ़वाल कुमाऊं की कुलदेवी और राजमाता माना जाता है और नौटी गांव से नंदा देवी के मायके से विदा करके उनकी ससुराल पति भगवान शिव के धाम कैलाश होम कुंड चार सींगों वाले खांडू चौसिगिया मेंठे की अगुवाई मैं भेजा जाता है जहां यात्रा पूरी कराने और मां नंदा देवी को विदाई देने के बाद वह हिमालय पर्वत की ओर चला जाता है और अदृश्य हो जाता है।

धार्मिक मान्यताओं और आस्था विश्वास श्रद्धा की नंदा देवी राजजात यात्रा जो कि बारह साल बाद आयोजित किया जाता है इस यात्रा को हिमालय का कुम्भ भी कहा जाता है क्योंकि यह यात्रा मां नंदा देवी पार्वती जी को उनके मायके से ससुराल कैलाश पर्वत पर विदा करने की लोक परम्परा है और एक हजार साल पुरानी इस यात्रा को चमोली के राजा शालीपाल के द्वारा प्रारम्भ की गई थी और शाही संरक्षण मैं कत्यूरी राजाओं चंद्रवंश और बाद मैं गढ़वाल नरेशों ने इसे सांस्कृतिक एवं धार्मिक महाकुंभ का संरक्षण दिया और प्राचीन काल मैं राजा अपने लाव-लश्कर के साथ इस यात्रा मैं शामिल होते थे जिसके चलते इस यात्रा को राजजात यात्रा कहा जाता है और इस पौराणिक महत्व की यात्रा पूरी होने तक पहाड़ी दुर्गम रास्तों पर हर जगह आस्था श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ता है और यात्रा पड़ाव पर भव्य आयोजन स्वागत किया जाता है और एक बेटी को मायके से ससुराल विदाई का जश्न मनाया जाता है