​गोरक्षपीठ का वह गुमनाम उत्तराधिकारी: छत्तीसगढ़ के बागबाहरा से निकला एक सिद्ध योगी और सत्ता का महान त्याग

​भारतीय राजनीति और अध्यात्म के केंद्र में स्थित गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरक्षपीठ का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। लेकिन इस मठ के उत्तराधिकार और

​विजय दीक्षित
सीनियर एडिटर, अमृत बाजार पत्रिका युगान्तर समूह, कोलकाता
​भारतीय राजनीति और अध्यात्म के केंद्र में स्थित गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरक्षपीठ का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। लेकिन इस मठ के उत्तराधिकार और नाथ संप्रदाय की जड़ों से जुड़ा एक ऐसा अनछुआ ऐतिहासिक सच है, जो दशकों तक वाल्टेयर (Waltair) रेलवे लाइन पर बसे छत्तीसगढ़ के बागबाहरा (तत्कालीन रायपुर, अब महासमुंद जिला) में मौन तपस्या करता रहा। यह कहानी है बागबाहरा के एक जमींदार परिवार के उन दो भाइयों की, जिन्होंने अलग-अलग रास्तों से देश के सामाजिक और आध्यात्मिक पटल पर अमिट छाप छोड़ी। इनमें से एक हैं प्रख्यात समाजवादी नेता रामगुलाम सिंह जिन्हें पूरा प्रदेश 'दादा ठाकुर' कहता है, और दूसरे थे गोरक्षपीठ के शीर्ष योगियों में शुमार—'कबड्डी कमंडल नाथ जी'।
​जमींदार परिवार के मंझले और सबसे छोटे भाई की अलग-अलग राहें
बागबाहरा के इस संपन्न जमींदार परिवार में सात भाई-बहनों का जन्म हुआ था। इनमें कमंडल नाथ जी मंझले (दूसरे नंबर के) भाई थे, जबकि रामगुलाम सिंह 'दादा ठाकुर' सबसे छोटे (सातवें नंबर के) भाई हैं। एक ही छत के नीचे पले-बढ़े इन दो भाइयों ने जीवन के दो बिल्कुल अलग लेकिन कठोर मार्ग चुने। दादा ठाकुर ने जहां अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए समाजवादी आंदोलन का झंडा उठाया, आपातकाल में प्रख्यात नेता मधु लिमये के साथ जेल गए और 54 से अधिक बार जेल की सलाखों के पीछे से जन-अधिकारों की लड़ाई लड़ी। वहीं, उनके मंझले भाई कमंडल नाथ ने वैराग्य का मार्ग अपना लिया। आज सात भाई-बहनों के इस भरे-पूरे परिवार में अकेले दादा ठाकुर ही जीवित बचे हैं, जो इस पूरी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा के एकमात्र चश्मदीद गवाह हैं।
​हाथी पर सवार होकर गोरखपुर की वो ऐतिहासिक यात्रा
कमंडल नाथ जी के जीवन का बदलाव किसी महाकाव्य से कम नहीं है। युवावस्था में एक मामले में उन्हें 20 वर्ष की लंबी सजा सुनाई गई थी। रायपुर जिला जेल की सलाखों के पीछे रहते हुए उनके भीतर वैराग्य का ऐसा बीज फूटा कि जेल से बाहर आते ही उन्होंने अध्यात्म की राह पकड़ ली। उनका विद्रोही और दृढ़ स्वभाव इस बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने अपने हिस्से की कुछ जमीन बेची, एक हाथी खरीदा और उसी हाथी पर सवार होकर गोरखपुर के गोरखनाथ मठ की ओर निकल पड़े। रास्ते में वे कुछ दिन विश्रामपुर (अंबिकापुर) में भी रुके और वहां से सीधे गोरखपुर पहुंचे।
​शारीरिक रूप से अत्यंत बलिष्ठ और 'कबड्डी' के शौकीन इस युवा संन्यासी को गोरखपुर मठ के तत्कालीन पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ जी ने स्वयं 'कबड्डी कमंडल नाथ' का नाम दिया था।
​उत्तराधिकार का वो बड़ा त्याग और बागबाहरा वापसी
कमंडल नाथ जी ने लगभग तीन दशक (30 वर्ष) तक गोरखपुर मठ में रहकर कठोर तपस्या की और नाथ संप्रदाय के एक सिद्ध और दबंग योगी के रूप में अपनी पहचान बनाई। जब महंत अवैद्यनाथ जी के उत्तराधिकारी को चुनने का समय आया, तो मठ के सामने दो सबसे प्रमुख और दबंग नाम थे—पहला नाम कबड्डी कमंडल नाथ का और दूसरा योगी आदित्यनाथ (वर्तमान मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश) का। उम्र में कमंडल नाथ जी योगी आदित्यनाथ से काफी बड़े और वरिष्ठ थे।
​दादा ठाकुर बताते हैं कि कमंडल नाथ जी किसी भी तरह के विवाद या प्रतिस्पर्धा के पक्षधर नहीं थे। एक सच्चे संन्यासी की तरह उन्होंने स्वयं ही मठ के महंत बनने का त्याग कर दिया, जिसके बाद योगी आदित्यनाथ मठ के एकमात्र उत्तराधिकारी बने और उन्हें गद्दी प्राप्त हुई।
​मिथक बनाम यथार्थ: जनश्रुतियों से परे का असली इतिहास
समय के साथ महान हस्तियों के इर्द-गिर्द कैसे किंवदंतियां बुन जाती हैं, कमंडल नाथ जी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। आज इंटरनेट पर बागबाहरा के शिव मंदिर के बारे में जानकारी मिलती है कि वे 'कैमरा तकनीक के आने से पहले के किसी प्राचीन काल के सिद्ध संत' थे, जिनके पास अकाल में पानी देने वाला कोई जादुई 'अक्षय कमंडल' था।
​लेकिन, इतिहास का असली सच इन मिथकों से कहीं अधिक विस्मयकारी है। वे किसी अज्ञात प्राचीन काल के नहीं, बल्कि हमारे इसी युग के संत थे, जिन्होंने मात्र 14-15 वर्ष पूर्व (छत्तीसगढ़ राज्य गठन के कुछ समय बाद) अपनी देह त्यागी थी। उनके 'कमंडल' का रहस्य किसी जादू में नहीं, बल्कि उनके अदम्य शारीरिक बल और 'कबड्डी' के प्रेम में छिपा था।
​उत्तराधिकार त्यागने के बाद वे वापस छत्तीसगढ़ आ गए। उन्होंने आरंग और फिर बागबाहरा में अपनी ही पैतृक जमीन पर नाथ संप्रदाय के शिव मंदिर की स्थापना की। स्थानीय जनमानस ने उनके तपोबल से प्रभावित होकर उन्हें पौराणिक संत का दर्जा दे दिया, लेकिन उनके वास्तविक जमींदार परिवार और महंत अवैद्यनाथ व योगी आदित्यनाथ से उनके सीधे संबंधों का इतिहास पीछे छूट गया।
​महंत अवैद्यनाथ का आशीर्वाद और आज भी कायम सम्मान
कमंडल नाथ जी के त्याग का ही प्रभाव था कि गोरखपुर के सांसद रहते हुए महंत अवैद्यनाथ जी स्वयं कई बार बागबाहरा स्थित इस शिव मंदिर में आए और अपने इस प्रिय सिद्ध योगी को आशीर्वाद दिया। उस दौर में नाथ संप्रदाय से जुड़े जो भी साधु-संत बागबाहरा आते थे, वे परंपरा के अनुसार खल्लारी देवी और चंडी देवी के मंदिरों के दर्शन अवश्य करते थे।
​कमंडल नाथ जी के उस ऐतिहासिक त्याग के प्रति वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के मन में आज भी अगाध सम्मान है। दादा ठाकुर बताते हैं कि बीते 6 मार्च (सोमवार) को गोरखपुर में योगी जी से उनकी एक विशेष मुलाकात तय थी, लेकिन समयाभाव के कारण वे गोरखपुर नहीं पहुंच सके और उसी दिन वे नेपाल के पोखरा होते हुए पशुपतिनाथ दर्शन के लिए निकल गए।
​इतिहास के पन्नों में अक्सर सत्ता की गूंज दर्ज होती है, लेकिन कबड्डी कमंडल नाथ जी जैसे संन्यासियों का त्याग यह साबित करता है कि असली ऊंचाई सत्ता पाने में नहीं, बल्कि उसे सहजता से ठुकरा कर लोक-कल्याण के लिए अपनी जड़ों की ओर लौट आने में है।