आदिवासियों के उत्थान, शिक्षा और आत्मरक्षा के अग्रदूत हैं आदि गुरु भगवान परशुराम

उत्तरप्रदेश, संजय साग़र सिंह। भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को धर्म, न्याय, ज्ञान और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। उनके व्यक्तित्व और

आदिवासियों के उत्थान, शिक्षा और आत्मरक्षा के अग्रदूत हैं आदि गुरु भगवान परशुराम

बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि आदि गुरु भगवान परशुराम ने आदिवासी समुदायों को न केवल शिक्षा प्रदान की, बल्कि आत्मरक्षा के गुण भी सिखाए, जिससे वे आत्मनिर्भर और सशक्त बन सकें: डॉ उमेश शर्मा 

भगवान आदि गुरु ने शिक्षा, सुरक्षा और कलरीपायट्टु कला के माध्यम से दक्षिण भारत में वैदिक संस्कृति का किया व्यापक प्रसार : समाजसेवी राजीव शर्मा 

उन्होंने निरक्षर और पिछड़े वर्गों को शिक्षित कर उन्हें सशक्त बनाया और गैर-परंपरागत अस्त्र-शस्त्रों के उपयोग का ज्ञान भी दिया: समाजसेवी राजू शर्मा 

हम आदि उनके महान आदर्शों को समझें और उनके द्वारा किए गए न्याय, धर्म, शिक्षा, आत्मसुरक्षा, एकता और समाजहित के कार्यों को स्मरण करते हुए उन्हें अपने जीवन में अपनाएं : अरविन्द पुष्कर एडवोकेट 

उत्तरप्रदेश, संजय साग़र सिंह। भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को धर्म, न्याय, ज्ञान और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए वरिष्ठ समाजसेवी डॉ उमेश शर्मा ने बताया कि बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि आदि गुरु भगवान परशुराम ने दक्षिण भारत के आदिवासी, भील और करात जनजातियों को न केवल वैदिक ज्ञान से परिचित कराया, बल्कि आदिवासियों को आत्मरक्षा के लिए प्राचीन मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु का प्रशिक्षण भी दिया। इस कला के माध्यम से उन्होंने शिक्षा और सुरक्षा दोनों का संतुलित विकास सुनिश्चित किया। उन्होंने निरक्षर और पिछड़े वर्गों को शिक्षित कर उन्हें सशक्त बनाया और गैर-परंपरागत अस्त्र-शस्त्रों के उपयोग का ज्ञान भी दिया। बताया जाता है कि भगवान परशुराम को वदक्कन कलरी शैली का आदि गुरु माना जाता है, जिसमें अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग पर विशेष बल दिया जाता है। उन्होंने जंगलों में शिकार, आत्मरक्षा और विषबुझे तीरों के उपयोग जैसी तकनीकों का भी प्रशिक्षण दिया। आदि गुरु भगवान परशुराम आदिवासियों के उत्थान, शिक्षा और आत्मरक्षा के अग्रदूत हैं। उन्होंने आदिवासी समुदायों को न केवल शिक्षा प्रदान की, बल्कि आत्मरक्षा के गुण भी सिखाए, जिससे वे आत्मनिर्भर और सशक्त बन सकें।

आदि गुरु भगवान परशुराम ने शिक्षा, सुरक्षा और कलरीपायट्टु कला के माध्यम से दक्षिण भारत में वैदिक संस्कृति का व्यापक प्रसार किया : समाजसेवी राजीव शर्मा 

समाजसेवी राजीव शर्मा (लाला भाई)ने बताया कि इस वर्ष भगवान परशुराम की जयंती 19 अप्रैल को मनाई जाएगी। उन्होंने देशवासियों को अग्रिम शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि आदि गुरु भगवान परशुराम ने सनातन संस्कृति के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका उद्देश्य केवल युद्ध कौशल सिखाना नहीं था, बल्कि प्रकृति और जीव-जगत के संरक्षण के साथ संतुलित जीवन का संदेश देना भी था। वे चाहते थे कि मानव, पशु-पक्षी, वृक्ष और प्रकृति के बीच सामंजस्य बना रहे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कोंकण, गोवा और केरल जैसे क्षेत्रों के विकास और बसावट का श्रेय भी भगवान परशुराम को दिया जाता है। माना जाता है कि उन्होंने अपने पराक्रम से समुद्र को पीछे हटाकर नई भूमि का निर्माण किया। उन्होंने शिक्षा, सुरक्षा और कलरीपायट्टु कला के माध्यम से दक्षिण भारत में वैदिक संस्कृति का व्यापक प्रसार किया।

उन्होंने निरक्षर और पिछड़े वर्गों को शिक्षित कर उन्हें सशक्त बनाया और गैर-परंपरागत अस्त्र-शस्त्रों के उपयोग का ज्ञान भी दिया: समाजसेवी राजू शर्मा 

समाजसेवी राजू शर्मा ने बताया कि आदिवासियों के रक्षक और मार्गदर्शक के रूप में आदि गुरु भगवान परशुराम की महत्वपूर्ण व्याख्या में भारतीय इतिहास और परंपराओं की गहराइयों में झांकने पर कई ऐसे पहलू सामने आते हैं, जो समय के साथ धुंधले पड़ गए या गलत ढंग से प्रस्तुत किए गए। आदि गुरु भगवान परशुराम को लेकर भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिलती है। प्रचलित कथाओं में उन्हें अक्सर क्षत्रियों के विनाशक के रूप में चित्रित किया जाता है, यह ग़लत हैं जबकि ऐतिहासिक प्रमाण इस धारणा की पुष्टि नहीं करते। वहीं दूसरी ओर, लोक परंपराओं और आदिवासी समाज के बुजुर्गों के कथनों में भगवान परशुराम को एक रक्षक, मार्गदर्शक और हितैषी के रूप में देखा जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने आदिवासी समुदायों को आत्मरक्षा के गुण सिखाए और निरक्षर और पिछड़े वर्गों को शिक्षित कर उन्हें सशक्त बनाया और गैर-परंपरागत अस्त्र-शस्त्रों के उपयोग का ज्ञान भी दिया। भगवान परशुराम केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक और आदिवासी उत्थान के अग्रदूत भी थे।

हम आदि उनके महान आदर्शों को समझें और उनके द्वारा किए गए न्याय, धर्म, शिक्षा, आत्मसुरक्षा, एकता और समाजहित के कार्यों को स्मरण करते हुए उन्हें अपने जीवन में अपनाएं : अरविन्द पुष्कर एडवोकेट 

डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचारधारा से जुड़ती ऐतिहासिक दृष्टि - शिक्षा, समानता और अधिकारों पर केंद्रित विमर्श को रेखांकित करते हुए समाजसेवी अरविन्द पुष्कर एडवोकेट ने कहा कि इस संदर्भ में डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर जी के विचार विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने भी आदिवासीसमाज के उत्थान के लिए शिक्षा, संवैधानिक अधिकार, सामाजिक समानता और मुख्यधारा में भागीदारी को अत्यंत आवश्यक बताया। डॉ. अंबेडकर जी ने उनके महान विचारों को गहराई से समझा और आदिवासियों के हित में आगे बढ़ाने का कार्य किया और उन प्रेरणादायक पहलुओं को सामने लाएं, जो समाज के हर वर्ग को जोड़ने और आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं। अम्बेडकर जी का यह दृष्टिकोण भी उस महान ऐतिहासिक वैदिक सोच से मेल खाता है, जिसमें भारतीय सनातन समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने पर जोर दिया गया है। आज आतंकी दुश्मनों से जूझ रहे भारत को आवश्यकता है कि हम आदि गुरु भगवान परशुराम के महान आदर्शों को समझें और उनके द्वारा किए गए न्याय, धर्म, शिक्षा, आत्मसुरक्षा, एकता और समाजहित के कार्यों को स्मरण करते हुए उन्हें अपने जीवन में अपनाएं।

आखिर में सभी समाजसेवीयों ने कहा कि आदि गुरु भगवान परशुराम से जुड़ी कहानियों को एकांगी दृष्टिकोण से देखने के बजाय, उन्हें व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। इससे न केवल ऐतिहासिक तथ्यों की स्पष्टता बढ़ेगी, बल्कि समाज में एकता, आपसी समरसता और जागरूकता भी विकसित होगी। आज आवश्यकता है कि हम इतिहास को पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर देखें और उन प्रेरणादायक पहलुओं को सामने लाएं, जो समाज के हर वर्ग को जोड़ने और आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं।