अर्धरोगहरी निद्रा: क्या प्रातःकालीन सूर्यस्नान बेहतर नींद की कुंजी हो सकता है?
आयुर्वेद में एक प्रसिद्ध उक्ति है—“अर्धरोगहरी निद्रा”, अर्थात् अच्छी नींद आधे रोगों को हर लेने की क्षमता रखती है। आधुनिक विज्ञान भी आज इस तथ्य को स्वीकार करता है
वैद्य बालेन्दु प्रकाश
आयुर्वेद में एक प्रसिद्ध उक्ति है—“अर्धरोगहरी निद्रा”, अर्थात् अच्छी नींद आधे रोगों को हर लेने की क्षमता रखती है। आधुनिक विज्ञान भी आज इस तथ्य को स्वीकार करता है कि अच्छी नींद शरीर की मरम्मत, रोग प्रतिरोधक क्षमता, मानसिक स्वास्थ्य और हार्मोनल संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
पिछले कुछ समय से मैंने स्वयं एक सरल प्रयोग प्रारम्भ किया। प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्य उदय के पश्चात लगभग 20–30 मिनट तक सूर्य की किरणों को पीठ पर लेते हुए तब तक बैठना या टहलना, जब तक शरीर में हल्का पसीना न आ जाए। आयुर्वेद में इसे आतपजन्य निराग्नि स्वेदन कहा जा सकता है।
इस अभ्यास के कुछ ही दिनों बाद मैंने अपनी नींद में उल्लेखनीय सुधार अनुभव किया। नींद शीघ्र आने लगी, रात्रि में जागना कम हुआ तथा प्रातःकाल अधिक ताजगी का अनुभव होने लगा।
रोचक तथ्य यह है कि हमारे पास उपलब्ध दीर्घकालिक अग्न्याशयशोथ (Chronic Pancreatitis) रोगियों के आंकड़ों में देर रात तक जागना और अनियमित दिनचर्या एक सामान्य प्रवृत्ति के रूप में दिखाई देती है। इससे यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या शरीर की जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) का असंतुलन भी रोग की प्रगति में भूमिका निभाता है?
आयुर्वेद में आतप सेवन, स्वेदन और निद्रा को स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण स्तंभों में गिना गया है। संभव है कि प्रातःकालीन सूर्यस्नान केवल विटामिन D प्राप्त करने का माध्यम न होकर शरीर की जैविक लय को पुनर्स्थापित करने का भी एक प्राकृतिक उपाय हो।
यह विषय आगे वैज्ञानिक अध्ययन की मांग करता है। किंतु इतना स्पष्ट है कि नियमित दिनचर्या, समय पर सोना, प्रातःकालीन सूर्यस्नान और पर्याप्त नींद—स्वास्थ्य सुधार की दिशा में सरल किन्तु प्रभावी कदम हो सकते हैं।
अर्धरोगहरी निद्रा — और संभवतः प्रातःकालीन आतप सेवा, अच्छी निद्रा की एक महत्वपूर्ण सहायक।
वैद्य बालेन्दु प्रकाश
राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री से अलंकृत वर्ष 1999


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