होली को उत्सव की तरह मनाएं नशा,मांसाहार से नहीं
होली परंपरागत रूप से रंगों का पर्व कहलाती है। लोग मिलते हैं, हँसते हैं, पुराने गिले मिटाते हैं, और जीवन में थोड़ा हल्कापन आता है। यह सब सुंदर है।
होली परंपरागत रूप से रंगों का पर्व कहलाती है। लोग मिलते हैं, हँसते हैं, पुराने गिले मिटाते हैं, और जीवन में थोड़ा हल्कापन आता है। यह सब सुंदर है। उत्सव जीवन का विरोध नहीं है। लेकिन होली के साथ जो एक दूसरी चीज़ लगातार जुड़ती जा रही है, वह चिंताजनक है। रंगों की आड़ में बदतमीज़ी, “मस्ती” के नाम पर अभद्रता और नशे की बेहिसाब छूट, और परंपरा के नाम पर ऐसी हरकतें जिनका परंपरा से कोई रिश्ता ही नहीं। महिलाएँ असुरक्षित महसूस करें, सार्वजनिक स्थान अराजक हो जाएँ, किसी के घर की चीज़ें उठाकर दहन में डाल दी जाएँ, कहीं जानवर काटे जाएँ, और फिर कहा जाए, “बुरा न मानो, होली है,” तो प्रश्न उठेगा। प्रश्न यह नहीं कि होली मनाई जाए या नहीं। प्रश्न यह है कि हम होली के नाम पर क्या मना रहे हैं। हर साल होलिका दहन होता है। हर साल प्रतीक जलता है। फिर भी हमारी विकृतियाँ घटती क्यों नहीं? जो जलना था, वह बच कैसे जाता है? और जो जल गया था, वह बार-बार लौट कैसे आता है? कथा में एक पात्र है, हिरण्यकशिपु। हम उसे अक्सर किसी पुराने समय का “असुर राजा” समझ लेते हैं। पर वह केवल राजा नहीं है, वह एक मानसिकता है। “हिरण्य” का अर्थ है सोना, चमक, सुविधा का आकर्षण। “कशिपु” का अर्थ है शैया, आराम। यानी वह जो जीवन को सुरक्षा, सुविधा और स्वर्ण की शैया पर टिकाना चाहता है। यह वही आग्रह है जो भीतर बैठकर कहता रहता है: “मुझे कुछ न हो। मेरा नियंत्रण बना रहे। मेरी प्रतिष्ठा बनी रहे। मेरी व्यवस्था बनी रहे।” यह आग्रह, यही केन्द्र, यही ‘मैं’, यही अहंकार है। और कथा में यह भी संकेत है कि हिरण्यकशिपु ऋषि-वंश से है। यानी समस्या बाहर से नहीं आती, समस्या वहीं से भी निकल आती है जहाँ से ज्ञान निकला था। जब ज्ञान का उपयोग आत्म-शुद्धि के लिए नहीं, आत्म-रक्षा के लिए हो, तो वही ज्ञान अहंकार का हथियार बन जाता है। एक भ्रम यह भी है कि अहंकार आलसी होता है। नहीं। अहंकार बहुत अनुशासित हो सकता है। हिरण्यकशिपु ने तप किया। रावण ने तप किया। कई दानवी चरित्रों को भी वरदान मिले। तो प्रश्न तपस्या का नहीं, प्रश्न उद्देश्य का है। अनुशासन किसलिए? मेहनत किसलिए? सच्चाई के लिए या अपने झूठ को “अमर” करने के लिए?
हिरण्यकशिपु ने वरदान माँगा: दिन में नहीं मरूँगा, रात में नहीं; भीतर नहीं, बाहर नहीं; अस्त्र से नहीं, शस्त्र से नहीं; नर से नहीं, पशु से नहीं। ये सारी शर्तें एक ही बात कहती हैं: “मैं द्वैत की हर सीमा पर बचा रहूँ।” क्योंकि अहंकार की असली शरण द्वैत है। “मैं-तुम”, “अपना-पराया”, “दिन-रात”, “भीतर-बाहर”, इन्हीं दरारों में वह छुपता है। जहाँ दो हैं, वहाँ वह बच जाता है। झूठ भीतर से जानता है कि वह झूठ है। इसलिए अहंकार को भरोसा नहीं आता। भरोसा न आए तो वह घोषणा करवाता है: “मेरी पूजा होगी।” यह अहंकार की एक विचित्र क्षमता है। वह अपने ही किसी हिस्से को देवता बना देता है, और बाकी हिस्सा उसे पूजने लगता है। या फिर सीधे खुद ही ईश्वर होने का दावा कर देता है, ताकि भीतर का डर ढँका रहे। लेकिन भीतर डर बना रहता है। और तभी एक छोटी-सी बात घटती है जो पूरे साम्राज्य को हिला देती है। प्रह्लाद कोई राजनीतिक विद्रोही नहीं है। वह भीतर की वह निर्मल असहमति है जो कहती है: “नहीं। झूठ चाहे जितना शक्तिशाली हो, मैं उसका साथ नहीं दूँगा।” यह बात और भी तीखी इसलिए है क्योंकि हिरण्यकशिपु केवल राजा नहीं, पिता भी है। यानी कथा कहती है: सच के सामने कोई रिश्ता बड़ा नहीं। सच के सामने कोई सत्ता बड़ी नहीं। जो व्यक्ति कह देता है, “आप राजा हों, आप पिता हों, मैं सत्य छोड़कर आपके साथ नहीं जाऊँगा,” वही प्रह्लाद है। प्रह्लाद बाहर से नहीं आया। वह उसी घर में पैदा हुआ। मुक्ति की आकांक्षा बंधन के भीतर से उठती है। जहाँ घुटन गहरी होती है, वहीं से सबसे तेज़ पुकार उठती है। फिर होलिका आती है। वह केवल एक “बहन” नहीं है। वह वह व्यवस्था है जो सच को दबाना जानती है, कभी प्यार से, कभी डर से, कभी चुपचाप “दुर्घटना” बनाकर। कथा में कहा जाता है कि होलिका के पास एक ऐसा आवरण था जो उसे आग से बचाता था। उसने सोचा, बालक को गोद में ले जाकर आग में बैठ जाऊँ; मैं बच जाऊँगी, वह जल जाएगा। लेकिन यहाँ आग साधारण आग नहीं है। यह विवेक की आग है। विवेक वही है जो जानता है क्या जलना चाहिए और क्या बचना चाहिए। इसीलिए प्रह्लाद बचता है, होलिका जलती है। और यहीं से होली का मर्म सामने आता है: यह उत्सव उस दिन का नाम है जब सच के आगे झुकना चुना गया, और झूठ के आगे झुकने से इनकार किया गया। आज होली के नाम पर जो होता है, उसमें प्रह्लाद कहाँ है? कहाँ है वह सरलता, वह निर्दोषता, वह साहस? इसके बदले कई जगहों पर क्या दिखता है? नशा, मांस, उन्माद, महिलाओं पर पानी के गुब्बारे, सड़कों पर अराजकता, और “त्योहार” की आड़ में खुली छूट। तो सवाल सीधा है: इस पर्व का नशे और हिंसा से क्या संबंध है? इस कथा में “चिकन और दारू” कहाँ लिखा है? यह पर्व तो बताता है कि अहंकार कितना भी चालाक हो, सच्चाई उसे काट देगी। यह पर्व तो बताता है कि निर्दोषता की जीत होती है, चालाकी की नहीं। फिर हम किस तरह का उत्सव बना रहे हैं? हम हर वर्ष बड़े पैमाने पर दहन करते हैं: लकड़ी जलाते हैं, सार्वजनिक जगहों पर अव्यवस्था करते हैं, धुएँ में हवा को भरते हैं। यह सब किसलिए? यदि त्योहार का अर्थ “भीतर की विकृति का दहन” है, तो “बाहर का धुआँ” क्यों? आज हम उपभोग की एक वैश्विक संस्कृति में जी रहे हैं, जहाँ हर अवसर बाज़ार बन जाता है। त्योहार भी “इवेंट” बन जाते हैं। और इवेंट का नियम है: ज़्यादा खर्च, ज़्यादा उपभोग, ज़्यादा शोर। यह वही मानसिकता है जो जंगल काटती है, जीवाश्म ईंधन जलाती है, पृथ्वी को संसाधन-भंडार मानती है। भीतर की असुरक्षा बाहर की लूट बन जाती है। जब चेतना नहीं उठती, तो उपभोग बढ़ता है। और जब उपभोग बढ़ता है, तो प्रकृति जलती है। यह भी “हिरण्यकशिपु” ही है: स्वर्ण और सुरक्षा का लालच, जो हर सीमा पर अपना कवच चाहता है, चाहे धरती की कीमत पर ही क्यों न हो। हिरण्यकशिपु ने जिस खंभे को जड़ समझा, उसी से नरसिंह प्रकट हुए। यानी सत्य वहीं से आता है जहाँ अहंकार को उम्मीद नहीं होती। और फिर उसकी सारी शर्तें निष्फल हो जाती हैं। न दिन, न रात। न भीतर, न बाहर। न अस्त्र, न शस्त्र। न धरती, न आकाश। यह संकेत है कि अहंकार का सबसे बड़ा “सुरक्षा-चक्र” भी टूट सकता है। सत्य किसी भी द्वैत को अंतिम नहीं मानता।
होली छोड़ने की बात नहीं है। होली को ऊँचा करने की बात है। यदि कोई व्यक्ति अंडा फेंकने की प्रथा शुरू कर सकता है, तो कोई व्यक्ति बोध से जनित कोई अच्छी प्रथा भी शुरू कर सकता है। होली का अर्थ है: सृजनात्मकता, विवेक, और साहस। रंग खेलिए, मिलिए। पर याद रखिए, यह दिन छूट का नहीं, स्मरण का दिन है। यह दिन बेहोशी का नहीं, जागरण का दिन है। और सबसे ज़रूरी बात: होली का पहला संबंध सत्य से है। बाकी सब संबंध बाद में आते हैं।
कबीर साहब कहते हैं, “मन के बहुतक रंग हैं, पल-पल बदले सोय; एक रंग में जो रहे, ऐसा बिरला कोय।”
बाहर के रंग सुंदर हैं। पर भीतर उस “एक-रंगी” सत्य का स्मरण रहे, जिसके सामने ही सिर झुकना चाहिए।
आचार्य प्रशांत एक दार्शनिक और लेखक हैं। उनका कार्य आत्म-अन्वेषण और उसके समकालीन जीवन में अनुप्रयोग पर केंद्रित है।


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