देवभेंट समारोह और 42 किलो की ऐतिहासिक महाखंडा तलवार के हैरतअंगेज करतबों से सजा 18 घंटे का मर्दानी दशहरा
पुरंदर (प्रतिनिधि – विजयकुमार हरिश्चंद्रे) :
महाराष्ट्र का ध्यान आकर्षित करने वाला कुलस्वामी खंडोबा-म्हालसादेवी का जयाद्री पर्वत पर पारंपरिक मर्दानी दशहरा इस वर्ष पूरे 18 घंटे तक उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। भंडारे की वर्षा, आधुनिक पटाखों की शानदार आतिशबाजी, जयाद्री की सुसरटिंगी घाटी में पालकियों का रोमांचक सफर, मध्यरात्रि का सीमोल्लंघन समारोह, देवभेंट और ऐतिहासिक महाखंडा तलवार के हैरतअंगेज करतबों ने इस उत्सव को यादगार बना दिया। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा को निभाते हुए सभी जाति-धर्मों के श्रद्धालुओं ने इसमें भाग लिया और सामाजिक एकता का संदेश दिया।


पालकी समारोह का भव्य शुभारंभ
सोमवार की शाम जेजुरी गढ़ स्थित मंदिर में खंडोबा-म्हालसादेवी की मूर्तियों को विधि-विधान से सजाई गई पालकी में विराजमान किया गया। ग्रामवासी, मानकरी, पालकी वाहक, गुरव, कोली और गड़शी समाज के प्रतिनिधियों की भागीदारी से पालकी समारोह शुरू हुआ। मानकरी पेशवे बंधुओं के संकेत के बाद पालकी ने मंदिर के गढ़कोट से प्रस्थान किया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने बड़े पैमाने पर भंडारे की वर्षा की, वहीं पटाखों की आतिशबाजी से पूरा गढ़ परिसर जगमगा उठा।
मंदिर के गढ़कोट से पालकी जयाद्री की सुसरटिंगी घाटी होते हुए कड़ेपठार की दिशा में रवाना हुई। इसी दौरान कड़ेपठार की दूसरी पालकी भी देवभेंट समारोह के लिए निकली। सुसरटिंगी परिसर में दोनों पालकियों के पहुंचने से उत्साह चरम पर पहुंच गया।
मध्यरात्रि लगभग सवा दो बजे दर्पण में प्रतिबिंब के माध्यम से दोनों पालकियों का मुखदर्शन कराया गया और सीमोल्लंघन समारोह संपन्न हुआ। इस अवसर पर सभी जाति-धर्मों के नागरिकों ने पारंपरिक रीति से आपटा वृक्ष की पत्तियां लूटने की परंपरा निभाई। पूरी रात जारी रही आतिशबाजी से जयाद्री का आसमान रोशनी से नहा उठा।

रंगोली और पारंपरिक स्वागत से सजी पालकी यात्रा
सूर्योदय के साक्षी में पालकी ने जेजुरी ग्राम की परिक्रमा पूरी की और फिर गढ़ की ओर प्रस्थान किया। ग्रामवासियों ने रास्ते में आंगन और सड़कों पर सडा-रंगोली बनाकर पालकी का स्वागत किया। वाद्ययंत्रों की गूंज और भक्तिमय वातावरण के बीच पालकी यात्रा आगे बढ़ी। इस दौरान पालकी को कंधे पर उठाने के लिए खांदेकरी सेवकों के बीच पारंपरिक प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिली।
अंततः मंगलवार सुबह लगभग साढ़े सात बजे पालकी मंदिर पहुंची। स्थानीय लोककलाकारों ने पालकी के सामने अपनी कला प्रस्तुत कर इस परंपरा में सांस्कृतिक रंग भर दिए। परंपरा के अनुसार रोजमारा का वितरण होने के बाद देवी-देवताओं की मूर्तियों को पुनः उनके मूल स्थान पर विराजमान किया गया।
42 किलो की महाखंडा तलवार के करतबों ने रोमांचित किया
पालकी समारोह के बाद जेजुरी गढ़ पर ऐतिहासिक महाखंडा तलवार के साथ पारंपरिक तलवारबाजी और शक्ति-प्रदर्शन प्रतियोगिता शुरू हुई। लगभग 42 किलो वजनी इस ऐतिहासिक तलवार को एक हाथ से संतुलित करके थामने के करतब युवाओं के आकर्षण का केंद्र बने।
तलवार को दांतों से थामने, उसे घुमाने और अन्य हैरतअंगेज करतबों ने उपस्थित लोगों का ध्यान खींचा। पारंपरिक शौर्य, शारीरिक सामर्थ्य और मर्दानी कौशल का प्रदर्शन देखने के लिए बड़ी संख्या में नागरिक एकत्र हुए।
ऐतिहासिक महाखंडा तलवार को मेघडंबरी में स्थान देने की मांग
जयाद्री का मर्दानी दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जेजुरी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में सभी जाति-धर्मों के नागरिकों की भागीदारी सामाजिक सद्भाव और एकता का संदेश देती है।
इस बीच, देवस्थान समिति की ओर से मानकरियों और ग्रामवासियों को बड़े पैमाने पर उपहार वितरित किए गए। साथ ही, मीडिया में विज्ञापनों पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का मुद्दा भी उठाया गया। पूर्व ट्रस्टी संदीप जगताप ने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि सूखाग्रस्त लोगों को अब तक सहायता नहीं मिल सकी है।
जेजुरी की ऐतिहासिक महाखंडा तलवार को गढ़ की मेघडंबरी में स्थान दिया जाए, ऐसी मांग मानकरियों, ग्रामवासियों और भाजपा विधायक संजय केळकर द्वारा किए जाने की बात कही गई। हालांकि, इस मांग पर देवस्थान समिति की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने की आलोचना भी की गई। इस ऐतिहासिक तलवार को उचित सम्मानजनक स्थान मिलने की भावना व्यक्त की गई। इस मुद्दे पर पानसे सरदार घराने की भूमिका असहाय नजर आने की बात भी इस अवसर पर कही गई।
इस प्रकार भक्ति, शौर्य, लोककला, परंपरा और सामाजिक एकता का अनूठा संगम प्रस्तुत करने वाला जयाद्री का मर्दानी दशहरा इस वर्ष पूरे 18 घंटे चले उत्साहपूर्ण समारोह के साथ यादगार बन गया।