उत्तराखंड की रहस्यमयी रूपकुंड झील: हजारों फीट की ऊंचाई पर बिखरे सैकड़ों मानव कंकाल, वैज्ञानिक शोध ने खोले चौंकाने वाले राज

Kumaonadmin
10 Min Read

डीएनए जांच में सामने आई अलग-अलग मूल के लोगों की कहानी, करीब एक हजार वर्ष के अंतर से झील में पहुंचे मानव अवशेष; मौत की असली वजह अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं

देहरादून/चमोली। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में समुद्र तल से लगभग 5,029 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड झील लंबे समय से इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बनी हुई है। चारों ओर बर्फीली चोटियों और दुर्गम पहाड़ी रास्तों से घिरी इस छोटी-सी झील के किनारों पर सैकड़ों मानव कंकालों के अवशेष मिले हैं। इसी कारण इसे दुनिया भर में ‘कंकाल झील’ (Skeleton Lake) के नाम से भी जाना जाता है।

गर्मियों में जब झील की बर्फ पिघलती है, तब पानी के आसपास बिखरे मानव अवशेष दिखाई देने लगते हैं। सवाल यह रहा है कि आखिर इतनी दुर्गम और ऊंचाई वाली जगह पर इतने लोगों की मृत्यु कैसे हुई? क्या वे किसी प्राकृतिक आपदा के शिकार बने, किसी धार्मिक यात्रा पर निकले थे या उनके यहां पहुंचने की कहानी कुछ और है?

वर्ष 2019 में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Nature Communications में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण शोध ने इस रहस्य के कई पहलुओं पर नई रोशनी डाली। प्राचीन डीएनए, रेडियोकार्बन डेटिंग और हड्डियों में मौजूद रासायनिक संकेतों के अध्ययन से पता चला कि झील में मिले सभी लोग एक ही समूह के नहीं थे और न ही सभी की मृत्यु एक ही समय पर हुई थी।

1942 में दुनिया का ध्यान इस झील की ओर गया

रूपकुंड के कंकालों के बारे में आधुनिक दौर में व्यापक जानकारी वर्ष 1942 में सामने आई, जब एक ब्रिटिश वन अधिकारी की इस क्षेत्र में मौजूदगी के दौरान मानव अवशेषों की चर्चा हुई। इसके बाद विभिन्न शोधकर्ताओं और अभियानों ने इस स्थान का अध्ययन किया।

शुरुआत में यह अनुमान लगाया गया कि यहां किसी बड़े दल, सैनिक टुकड़ी या यात्रियों की सामूहिक मृत्यु हुई होगी। कुछ लोगों ने महामारी को भी संभावित कारण माना। स्थानीय लोककथाओं में एक राजा, रानी और उनके साथियों की धार्मिक यात्रा का उल्लेख मिलता है, जिनके बारे में कहा जाता है कि देवी नंदा के प्रकोप से उनकी मृत्यु हो गई थी।

हालांकि, इन कहानियों और शुरुआती अनुमानों में से किसी को भी सभी कंकालों की उत्पत्ति का प्रमाणित उत्तर नहीं माना जा सकता था।

डीएनए जांच ने बदली रहस्य की पूरी तस्वीर

वर्ष 2019 में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय शोध में वैज्ञानिकों ने रूपकुंड से मिले 38 व्यक्तियों के अवशेषों का जीनोम-स्तरीय प्राचीन डीएनए विश्लेषण किया। इसके साथ रेडियोकार्बन डेटिंग और हड्डियों में पाए जाने वाले स्थिर समस्थानिकों का भी अध्ययन किया गया।

परिणाम चौंकाने वाले थे। अध्ययन में इन 38 व्यक्तियों को तीन अलग-अलग आनुवंशिक समूहों में रखा गया।

पहले समूह में 23 व्यक्ति ऐसे थे, जिनकी आनुवंशिक विशेषताएं दक्षिण एशिया की वर्तमान आबादी में पाई जाने वाली विविधता के दायरे में आती थीं। दूसरे समूह के 14 व्यक्तियों में पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र से संबंधित आनुवंशिक समानताएं मिलीं। तीसरा समूह केवल एक व्यक्ति का था, जिसकी आनुवंशिक विशेषताएं दक्षिण-पूर्व एशिया से संबंधित आबादियों के करीब थीं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी लोगों की राष्ट्रीयता या उनके जीवन की पूरी कहानी पता चल गई। डीएनए से मिले संकेत उनके पूर्वजों से संबंधित आनुवंशिक समानताओं को दर्शाते हैं, न कि अपने आप में किसी व्यक्ति की निश्चित नागरिकता या यात्रा का मार्ग।

करीब एक हजार साल का अंतर: सबसे बड़ा खुलासा

इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष मानव अवशेषों की आयु से जुड़ा था। वैज्ञानिकों ने रेडियोकार्बन डेटिंग की मदद से पाया कि रूपकुंड में मिले सभी लोगों के अवशेष एक ही घटना में जमा नहीं हुए थे।

दक्षिण एशियाई आनुवंशिक समूह के व्यक्तियों के अवशेषों की अनुमानित तिथियां लगभग 7वीं से 10वीं शताब्दी ईस्वी के बीच की थीं। वहीं पूर्वी भूमध्यसागरीय आनुवंशिक समानता वाले अधिकांश व्यक्तियों के अवशेष लगभग 17वीं से 20वीं शताब्दी के बीच के निकले। दक्षिण-पूर्व एशियाई आनुवंशिक समानता वाले एक व्यक्ति का अवशेष भी इसी बाद के कालखंड में रखा गया।

इस तरह अध्ययन ने कम से कम दो प्रमुख कालखंडों में अवशेषों के झील तक पहुंचने के प्रमाण दिए, जिनके बीच लगभग एक हजार वर्ष का अंतर था। पहले समूह के लोग भी संभवतः अलग-अलग घटनाओं में मरे थे।

यह खोज उस धारणा के विपरीत थी कि झील के सभी कंकाल किसी एक ही दिन हुई सामूहिक दुर्घटना के परिणाम हैं।

क्या ओलावृष्टि बनी थी मौत की वजह?

रूपकुंड के रहस्य से जुड़ा एक प्रमुख सवाल यह है कि लोगों की मृत्यु कैसे हुई। वैज्ञानिकों ने कुछ हड्डियों में ऐसे चोट-संबंधी संकेतों का उल्लेख किया है, जो सिर पर लगी चोटों या किसी हिंसक प्राकृतिक घटना की संभावना के अनुरूप हो सकते हैं। आसपास के क्षेत्र में कभी-कभी भीषण ओलावृष्टि भी होती है।

इसी आधार पर यह संभावना व्यक्त की गई कि कुछ लोगों की मृत्यु किसी गंभीर मौसम संबंधी घटना के दौरान हुई हो सकती है। लेकिन उपलब्ध शोध यह सिद्ध नहीं करता कि झील में मिले सभी लोगों की मौत ओलों से ही हुई थी।

न ही सभी अवशेषों को किसी एक तूफान, महामारी या युद्ध से जोड़ने के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं। अलग-अलग समय पर हुई मौतों के कारण भी अलग-अलग हो सकते हैं।

क्या ये लोग नंदा देवी राजजात यात्रा पर आए थे?

रूपकुंड का संबंध स्थानीय धार्मिक परंपराओं और नंदा देवी क्षेत्र की यात्राओं से भी जोड़ा जाता है। नंदा देवी राजजात उत्तराखंड की महत्वपूर्ण पारंपरिक धार्मिक यात्राओं में शामिल है।

शोधकर्ताओं ने यह संभावना व्यक्त की कि दक्षिण एशियाई मूल वाले कुछ लोग किसी प्राचीन तीर्थयात्रा के दौरान इस क्षेत्र में पहुंचे होंगे। आसपास के मंदिरों में मिले कुछ ऐतिहासिक अभिलेख इस क्षेत्र में पुरानी धार्मिक परंपराओं की संभावना का संकेत देते हैं।

हालांकि, यह अभी प्रमाणित नहीं है कि रूपकुंड के सभी या अधिकांश कंकाल किसी एक राजजात यात्रा के यात्रियों के ही हैं। खासकर बाद के कालखंड में मृत्यु को प्राप्त हुए भूमध्यसागरीय आनुवंशिक समूह के लोगों की इस दुर्गम हिमालयी क्षेत्र तक पहुंचने की कहानी अब भी अनसुलझी है।

हड्डियों में छिपी थी खानपान की कहानी

शोधकर्ताओं ने हड्डियों में मौजूद कार्बन और नाइट्रोजन के स्थिर समस्थानिकों का भी अध्ययन किया। ऐसे संकेत किसी व्यक्ति के जीवन के अंतिम वर्षों के खानपान के बारे में जानकारी देने में मदद कर सकते हैं।

अध्ययन में दोनों प्रमुख समूहों के खानपान से जुड़े संकेतों में अंतर पाया गया। इससे इस निष्कर्ष को अतिरिक्त समर्थन मिला कि वे लोग अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आए थे और संभवतः उनकी जीवनशैली भी एक जैसी नहीं थी।

यह तकनीक किसी व्यक्ति ने क्या खाया, इसकी हर वस्तु की निश्चित सूची नहीं देती, लेकिन लंबे समय तक अपनाए गए आहार के स्वरूप का अनुमान लगाने में उपयोगी होती है।

रहस्य अब भी पूरी तरह नहीं सुलझा

रूपकुंड झील का वैज्ञानिक महत्व इस बात में है कि यहां मिले अवशेष केवल एक सामूहिक मृत्यु की कहानी नहीं बताते, बल्कि अलग-अलग समय और भिन्न आनुवंशिक पृष्ठभूमियों के लोगों की मौजूदगी की ओर संकेत करते हैं।

फिर भी कई प्रश्न बाकी हैं। बाद के कालखंड में पूर्वी भूमध्यसागरीय आनुवंशिक समानता वाले लोग हिमालय के इस दुर्गम क्षेत्र तक क्यों पहुंचे? उनकी मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई? और झील के आसपास मिले सभी अवशेषों का पूरा कालक्रम क्या है?

इन सवालों के उत्तर के लिए आगे के पुरातात्विक, आनुवंशिक और ऐतिहासिक अध्ययन आवश्यक हैं।

रूपकुंड आज भी हिमालय के सबसे चर्चित पुरातात्विक रहस्यों में शामिल है। यहां की बर्फ के बीच छिपे मानव अवशेष हमें याद दिलाते हैं कि इतिहास की हर कहानी का उत्तर लोककथाओं में नहीं मिलता। कई बार हड्डियों, मिट्टी और प्राचीन डीएनए में दर्ज संकेत अतीत की ऐसी परतें खोलते हैं, जिनकी कल्पना भी पहले नहीं की गई थी।

स्रोत: Harney एवं सहयोगियों का शोधपत्र, Ancient DNA from the skeletons of Roopkund Lake reveals Mediterranean migrants in India, Nature Communications, 20 अगस्त 2019।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *