दीपावली का नाम आते ही मन में रोशनी, खुशियां, मिठाइयां, रंगोली और सजे-संवरे घरों की तस्वीर उभरने लगती है। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, घरों में साफ-सफाई शुरू हो जाती है, पुराने सामान को बाहर निकाला जाता है और हर कोई अपने आशियाने को सबसे खूबसूरत बनाने की तैयारी में जुट जाता है। आखिर दीपावली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि उमंग, उत्साह और नई शुरुआत का प्रतीक है।
लेकिन इस सारी भागदौड़ के बीच एक सवाल है, जिस पर शायद ही हम कभी गंभीरता से विचार करते हैं। जिस तरह हम दीपावली पर अपने घर के कोने-कोने की सफाई करते हैं, क्या कभी अपने मन के कोनों की सफाई भी करते हैं?

हम घर में जमा धूल-मिट्टी को देखकर बेचैन हो जाते हैं। दीवारों पर लगे दाग हमें अच्छे नहीं लगते। पुराने और अनुपयोगी सामान को घर में रखना हमें बोझ लगता है। हम घंटों लगाकर घर का हर कोना चमका देते हैं, लेकिन अपने भीतर जमा नकारात्मक विचारों, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, क्रोध और वर्षों पुरानी कड़वाहट को हटाने की कोशिश कितनी बार करते हैं?
दरअसल, दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल बाहर के अंधकार को दूर करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अंधकार को पहचानकर उसे भी समाप्त करने का प्रयास करना है।
घर की गंदगी दिखाई देती है, लेकिन मन की गंदगी अक्सर दिखाई नहीं देती।
यही सबसे बड़ी विडंबना है। हम दूसरों के व्यवहार में कमियां तलाशने में बहुत समय बिताते हैं, लेकिन कभी अपने व्यवहार का मूल्यांकन नहीं करते। हमें याद रहता है कि किसने हमारा अपमान किया, किसने हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाई, किसने जरूरत के समय हमारा साथ नहीं दिया और किसने हमारे विश्वास को तोड़ा। हम इन घटनाओं को अपने मन में इस तरह संजोकर रखते हैं, जैसे कोई कीमती विरासत हो।
धीरे-धीरे यही शिकायतें हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाती हैं। हम मुस्कुराते तो हैं, लेकिन भीतर नाराजगी रखते हैं। रिश्तों में रहते तो हैं, लेकिन मन में दूरी बनाए रखते हैं। दूसरों की खुशियां देखकर प्रसन्न होने के बजाय उनसे अपनी तुलना करने लगते हैं। कभी-कभी तो किसी दूसरे की तरक्की भी हमारे भीतर बेचैनी पैदा कर देती है।
क्या यही वह मन है, जिसमें हम मां लक्ष्मी का स्वागत करना चाहते हैं?
मां लक्ष्मी के आगमन की तैयारी में हम घर के दरवाजे साफ करते हैं, चौखट सजाते हैं, दीपक जलाते हैं और रंगोली बनाते हैं। यह सब हमारी आस्था और परंपरा का हिस्सा है। लेकिन क्या हमने कभी अपने मन के दरवाजे भी खोले हैं? क्या हमने कभी अपने भीतर झांककर देखा है कि वहां कितनी नकारात्मकता जमा हो चुकी है?
दीपावली हमें केवल घर सजाने का नहीं, स्वयं को संवारने का भी अवसर देती है।
जिस तरह घर में वर्षों से रखे अनुपयोगी सामान को हटाना जरूरी होता है, उसी तरह जीवन में उन विचारों और भावनाओं को भी छोड़ना जरूरी है, जो हमें आगे बढ़ने से रोकती हैं। हर पुरानी बात को याद रखना समझदारी नहीं होती। हर अपमान का जवाब देना जरूरी नहीं होता। हर बहस जीतना भी जरूरी नहीं होता। कई बार अपनी मानसिक शांति के लिए कुछ बातों को वहीं छोड़ देना ही सबसे बड़ी जीत होती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हम गलत व्यवहार को स्वीकार कर लें या अपने आत्मसम्मान से समझौता करें। किसी को माफ करने का मतलब यह भी नहीं कि उसे दोबारा अपनी जिंदगी में वही जगह दे दी जाए। बल्कि इसका अर्थ है कि हम अपने मन को उस व्यक्ति और उस घटना के प्रभाव से मुक्त करें, जिसने हमारी शांति छीन रखी है।
क्योंकि नफरत का सबसे बड़ा नुकसान उस व्यक्ति को नहीं होता, जिससे हम नफरत करते हैं, बल्कि उस मन को होता है जिसमें नफरत पलती है।
रिश्तों की सफाई भी उतनी ही जरूरी है, जितनी घर की सफाई।
आज के समय में हमारे घर तो बड़े और खूबसूरत होते जा रहे हैं, लेकिन रिश्तों में जगह कम होती जा रही है। एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग भी कई बार एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से बहुत दूर होते हैं। बातचीत की जगह अहंकार ने ले ली है, अपनापन औपचारिकता में बदल रहा है और रिश्तों में धैर्य की जगह अपेक्षाओं ने ले ली है।
हम चाहते हैं कि दूसरे हमें समझें, हमारी भावनाओं का सम्मान करें और हमारी गलतियों को माफ कर दें। लेकिन जब दूसरे की बारी आती है, तो हम अक्सर कठोर हो जाते हैं। हम चाहते हैं कि कोई हमारी चुप्पी समझे, लेकिन हम किसी दूसरे की खामोशी का कारण जानने की कोशिश नहीं करते।
इस दीपावली क्यों न हम अपने रिश्तों का भी आत्ममंथन करें? जहां गलती हमारी है, वहां माफी मांगने का साहस दिखाएं। जहां किसी अपने को हमारी जरूरत है, वहां उसके साथ खड़े हों। जहां बातचीत बंद है, वहां संवाद की शुरुआत करें। और जहां रिश्ते केवल दर्द दे रहे हैं, वहां अपनी सीमाएं तय करना भी सीखें।
याद रखिए, रिश्ते केवल खून के संबंधों से नहीं चलते, बल्कि उनमें विश्वास, सम्मान, संवेदनशीलता और समझदारी का होना भी जरूरी है।
मन की सफाई का अर्थ खुद को बेहतर इंसान बनाना भी है।
हम अक्सर दूसरों की बुराइयों पर चर्चा करते हैं, लेकिन अपने भीतर मौजूद कमियों को स्वीकार करने से बचते हैं। कभी हमारा अहंकार किसी का दिल दुखा देता है, कभी हमारा गुस्सा किसी अपने को हमसे दूर कर देता है और कभी हमारी जिद एक खूबसूरत रिश्ते को कमजोर कर देती है।
इसलिए इस दीपावली केवल दूसरों की गलतियों की सूची मत बनाइए। एक बार अपने भीतर भी झांकिए। सोचिए कि क्या हमारा व्यवहार किसी को तकलीफ पहुंचा रहा है? क्या हमारी वजह से कोई अपना हमसे दूर हो रहा है? क्या हम दूसरों की सफलता से खुश हो पाते हैं? क्या हमारे भीतर किसी के लिए बेवजह की ईर्ष्या या द्वेष तो नहीं है?
यदि इन सवालों के जवाब हमें असहज करते हैं, तो समझिए कि हमें भी अपने भीतर कुछ सफाई करने की जरूरत है।
दीपावली का एक सुंदर संदेश नई शुरुआत भी है। पुरानी बातों को पीछे छोड़कर जीवन में नई ऊर्जा, नए विचार और नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ना। जैसे अमावस्या की रात में एक छोटा-सा दीपक भी अंधकार को चुनौती देता है, वैसे ही हमारे भीतर का एक सकारात्मक विचार भी जीवन की अनेक निराशाओं को दूर कर सकता है।
यह जरूरी नहीं कि हमारे जीवन में सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार हो। हर रिश्ता वैसा नहीं मिलेगा, जैसा हमने सोचा था। हर व्यक्ति हमारी भावनाओं को नहीं समझेगा। हर प्रयास सफल नहीं होगा। लेकिन इन सबके बीच अपने मन की शांति बचाकर रखना हमारे अपने हाथ में है।
हमें यह भी समझना होगा कि खुशहाल जीवन का अर्थ केवल धन, संपत्ति, ऊंचा पद और भौतिक सुविधाएं नहीं हैं। जिस घर में पर्याप्त धन हो, लेकिन अपनों के बीच प्रेम न हो, वहां खुशियों की कमी रह सकती है। वहीं सीमित संसाधनों में भी रहने वाला परिवार प्रेम, सम्मान और संतोष के कारण बेहद समृद्ध हो सकता है।
इसलिए इस दीपावली किसी जरूरतमंद की मदद कीजिए, किसी उदास चेहरे पर मुस्कान लाइए, किसी बुजुर्ग के पास बैठकर उनकी बात सुनिए और अपने बच्चों को केवल महंगे उपहार ही नहीं, बल्कि प्रेम, संस्कार और संवेदनशीलता की सीख भी दीजिए।
और हां, खुद के प्रति भी थोड़ा उदार बनिए। अपनी असफलताओं के लिए स्वयं को कोसना बंद कीजिए। बीते हुए कल की गलतियों को जीवनभर की सजा मत बनाइए। खुद को एक और मौका दीजिए, क्योंकि नई शुरुआत करने के लिए किसी विशेष उम्र, तारीख या परिस्थिति की जरूरत नहीं होती।
अंततः दीपावली हमें यही याद दिलाती है कि प्रकाश का महत्व तभी है, जब वह अंधकार को दूर करे। दीपक केवल घर की दीवारों को रोशन न करें, बल्कि हमारे विचारों, व्यवहार और रिश्तों में भी उजाला फैलाएं।
इस बार जब आप अपने घर की सफाई करें, तो कुछ पल अपने मन के लिए भी निकालिए। मन में जमा शिकायतों को हटाइए, अहंकार को थोड़ा कम कीजिए, प्रेम और क्षमा के लिए जगह बनाइए और उन खुशियों को पहचानिए, जो हमारे आसपास होते हुए भी कई बार हमारी नकारात्मक सोच के कारण हमें दिखाई नहीं देतीं।
क्योंकि घर की सफाई से हमारा आशियाना सुंदर बनता है, लेकिन मन की सफाई से हमारा व्यक्तित्व सुंदर बनता है।
इस दीपावली केवल घर में दीप मत जलाइए, अपने भीतर भी एक ऐसा दीप जलाइए, जिसकी रोशनी आपके विचारों, आपके व्यवहार और आपके रिश्तों तक पहुंचे।
क्योंकि असली दीपावली उस दिन होगी, जब हमारा घर ही नहीं, हमारा मन भी रोशनी से भर जाएगा।
लेखिका- सिमरन शुक्ला